आंगन में लगी तुलसी के पौधे में जल चढ़ाते हुए सुमन की आँखों से आंसू की एक बूंद छलक कर मिट्टी में मिल गई। यह आंगन, यह नीम का पेड़, और वो पुरानी नक्काशीदार खिड़कियां... यह सब सिर्फ़ ईंट-पत्थर नहीं थे, सुमन के लिए यह उसका संसार था। पिछले सात सालों से वह इस 'शांति कुंज' की बहू थी। जब वह ब्याह कर आई थी, तब उसके ससुर जी, दीनानाथ जी जीवित थे। उन्होंने सुमन के सिर पर हाथ रखकर कहा था, "बहु, यह घर अब तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। इसकी दीवारों को कभी दरकने मत देना।"
सुमन ने उस वचन को गांठ बांध लिया था। लेकिन आज, उसी घर की नींव को कोई और नहीं, बल्कि खुद उस घर की मालकिन, उसकी सास 'रेवती देवी' खोदने पर तुली थीं।
रसोई में बर्तनों के पटकने की आवाज़ आ रही थी। रेवती देवी जोर-जोर से फोन पर बात कर रही थीं।
"हाँ बेटा, मैंने तय कर लिया है। अब इस पुराने खंडहर में मेरा दम घुटता है। तेरे पापा तो चले गए, अब मैं यह बोझा और नहीं ढो सकती। दलाल को बुला लिया है, आज शाम को सौदा पक्का हो जाएगा।"
सुमन ने पल्लू से आँखें पोंछी और अंदर गई। सामने सोफे पर उसके पति, 'राघव', सिर पकड़े बैठे थे। राघव स्वभाव से बहुत शांत और माँ के भक्त थे। वे चाहकर भी अपनी माँ के खिलाफ़ एक शब्द नहीं बोल पाते थे, भले ही अंदर ही अंदर वह घुट रहे हों।
"राघव," सुमन ने धीरे से उनके कंधे पर हाथ रखा। "आप माँ जी को समझाते क्यों नहीं? यह घर बाबूजी की निशानी है। उनकी आत्मा इसी घर के कोने-कोने में बसती है। हम इसे कैसे बेच सकते हैं?"
राघव ने लाचारी भरी नज़रों से सुमन को देखा। "तुम जानती हो सुमन, माँ के ऊपर 'शिखा' (राघव की बहन और सुमन की ननद) का कितना प्रभाव है। शिखा को शहर में अपना बिज़नेस शुरू करने के लिए पैसे चाहिए। उसने माँ को पट्टी पढ़ाई है कि इस पुराने घर को बेचकर शहर में एक छोटा फ्लैट ले लेते हैं और बाकी पैसे शिखा को दे देते हैं। माँ को लगता है कि फ्लैट में रहना 'मॉडर्न' है और यह घर 'कबाड़'।"
तभी रेवती देवी वहां आ गईं। उनके चेहरे पर एक अजीब सी कठोरता थी।
"क्या फुसुर-फुसुर हो रही है पति-पत्नी में? सुन लो कान खोलकर, आज शाम को मेहता ब्रोकर्स वाले आ रहे हैं। घर के कागज मैंने निकाल लिए हैं। राघव, तू बस दस्तखत कर देना। और बहु, तू अपना सामान समेटना शुरू कर दे। हमें अगले हफ़्ते तक यह घर खाली करना है।"
सुमन का दिल बैठ गया। "माँजी," उसने हिम्मत जुटाकर कहा, "पर हम कहाँ जाएंगे? यह घर इतना बड़ा है, खुला है। शहर के छोटे से फ्लैट में हम सब..."
"तू चुप कर!" रेवती देवी ने डांट दिया। "तुझे क्या पता शहर की सुख-सुविधाओं का? तू तो गांव की गंवार है। शिखा ठीक कहती है, इस पुराने मकान में रहकर हम भी पुराने हो गए हैं। मुझे लिफ्ट वाली बिल्डिंग में रहना है। और शिखा को पैसों की ज़रूरत है। बेटी का हक़ नहीं बनता क्या पिता की जायदाद पर?"
"माँजी, दीदी का हक़ बनता है, मैं मना नहीं कर रही। पर घर बेचकर? हम अपनी जमापूंजी से उनकी मदद कर सकते हैं," सुमन ने गिड़गिड़ाते हुए कहा।
"तुम्हारी जमापूंजी है ही कितनी?" रेवती देवी ने तंज कसा। "राघव की छोटी सी नौकरी से घर का खर्चा मुश्किल से चलता है। और यह घर करोड़ों का है। इसे बेचने पर ही मोटा पैसा मिलेगा। बस, मेरा फैसला आखिरी है।"
शाम को शिखा भी आ गई। उसके चेहरे पर लालच साफ झलक रहा था। वह अपनी माँ के साथ बैठकर नए फ्लैट के ब्रोशर देख रही थी, जबकि सुमन और राघव अपने ही घर में बेगाने हो गए थे।
मेहता ब्रोकर आया। घर का मुआयना हुआ। पुरानी सागौन की लकड़ियों, मजबूत दीवारों और खुले आंगन को देखकर मेहता की बाछें खिल गईं।
"माताजी, घर तो बहुत शानदार है। मैं आपको मुंह मांगी कीमत दूंगा। बस समझो डील पक्का," मेहता ने कहा।
रेवती देवी खुश हो गईं। "देख राघव, कितनी अच्छी कीमत मिल रही है। साइन कर दे।"
राघव का हाथ कांप रहा था। वह पेन नहीं उठा पा रहा था।
"अरे, क्या सोच रहा है? कर साइन!" शिखा ने उकसाया। "भैया, आप हमेशा इमोशनल होकर सोचते हो। प्रैक्टिकल बनो। माँ को बुढ़ापे में आराम चाहिए।"
तभी सुमन बीच में आ गई।
"माँजी, एक मिनट रुकिए।"
"अब क्या है तेरा?" रेवती देवी झल्लाईं।
सुमन अंदर कमरे में गई और एक लाल कपड़े में लिपटी पोटली और कुछ पासबुक लेकर आई। उसने वह सब टेबल पर रख दिया।
"माँजी, यह मेरे और राघव के पिछले सात सालों की बचत है। और यह... यह मेरे मायके से मिले हुए और मुंह दिखाई में मिले हुए सारे जेवर हैं।"
सब हैरान रह गए। शिखा ने पोटली की तरफ ललचाई नज़रों से देखा।
"तो? इनका हम क्या करें?" रेवती देवी ने पूछा।
"माँजी, शिखा दीदी को बिज़नेस के लिए 25 लाख चाहिए ना? इस पोटली में और इन एफ.डी. (Fixed Deposit) को तोड़कर लगभग 20 लाख हो जाएंगे। बाकी के 5 लाख के लिए राघव अपनी पी.एफ. (Provident Fund) से लोन ले लेंगे। आप यह सारा पैसा दीदी को दे दीजिये।"
"क्या?" शिखा चिल्लाई। "तुम पागल हो गई हो भाभी? घर बेचने पर हमें 2 करोड़ मिलेंगे। तुम्हारे इस चिल्लर से क्या होगा?"
सुमन ने शिखा की आँखों में आँखें डालकर कहा, "दीदी, घर बेचने पर पैसे तो मिलेंगे, पर 'घर' नहीं मिलेगा। बाबूजी ने यह घर अपनी मेहनत की एक-एक ईंट जोड़कर बनाया था। उन्होंने कहा था कि जब तक यह छत है, हमारा परिवार एक है। आप पैसे चाहती हैं ना? वो हम दे रहे हैं। अपना भविष्य, अपनी सुरक्षा, अपना बुढ़ापा गिरवी रखकर आपको पैसे दे रहे हैं। बस इस घर को मत बेचिए।"
रेवती देवी चुप थीं। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि सुमन ऐसा कुछ करेगी।
शिखा ने माँ का हाथ पकड़ा। "माँ, इसकी बातों में मत आना। यह सब नाटक है। यह चाहती है कि घर इसके नाम रहे और हमें कुछ न मिले। फ्लैट में हमारा नाम होगा, हमारे पास कैश होगा। पुरानी यादों से पेट नहीं भरता।"
रेवती देवी का मन फिर डोल गया। बेटी का मोह और फ्लैट का सपना उन पर हावी हो गया।
"सुमन, अपनी यह पोटली उठा ले। मुझे तेरा त्याग नहीं चाहिए। मुझे यह घर बेचना है मतलब बेचना है। राघव, साइन कर!" रेवती देवी ने कठोरता से कहा।
राघव ने बेबसी में पेपर उठाया। सुमन की आँखों से आंसू बह निकले। वह दौड़कर आंगन में तुलसी के पास गई और रोने लगी। उसे लगा आज वह बाबूजी से किया वादा हार गई।
राघव ने साइन कर दिए। सौदा पक्का हो गया। मेहता ने एडवांस का चेक रेवती देवी के हाथ में थमा दिया। शिखा का चेहरा चमक उठा।
"बधाई हो माँ! अब हम आज़ाद हैं," शिखा ने कहा।
अगले एक महीने में घर खाली करने की तैयारी शुरू हो गई। सुमन चुपचाप सामान पैक करती रही। हर कोना खाली करते वक्त उसका दिल रोता था। राघव भी अब घर जल्दी नहीं आता था, उसे उस खाली होते घर को देखकर डर लगता था।
जिस दिन घर छोड़ना था, उस दिन सुबह से बारिश हो रही थी। सामान ट्रक में लद चुका था।
रेवती देवी, शिखा और राघव कार में बैठने जा रहे थे। सुमन आखिरी बार घर का ताला लगाने के लिए रुकी थी।
तभी शिखा का फोन बजा। उसके पति का फोन था।
"क्या? इनकम टैक्स का छापा?" शिखा चीखी। "लेकिन वो पैसे तो मैंने..." शिखा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
रेवती देवी ने पूछा, "क्या हुआ शिखा?"
शिखा हड़बड़ाते हुए बोली, "माँ... वो... रमेश (पति) का फोन था। उनकी फैक्ट्री पर छापा पड़ा है। हमारे सारे बैंक अकाउंट फ्रीज़ हो गए हैं। और... और वो कह रहे हैं कि जो पैसा आप मुझे देने वाली थीं, वो अभी ट्रांसफर मत करना, वरना वो भी ज़ब्त हो जाएगा।"
"तो अब हम क्या करेंगे?" रेवती देवी घबरा गईं। "हमने तो नए फ्लैट के लिए बयाना भी नहीं दिया, सोचा था पूरा पेमेंट एक साथ करेंगे। अब वो फ्लैट भी हाथ से गया?"
"हाँ माँ," शिखा रो पड़ी। "और अभी हम अपने घर भी नहीं जा सकते। वहां पुलिस है। हमें कुछ दिन यहीं रुकना पड़ेगा।"
"यहीं? कहाँ?" रेवती देवी ने पूछा। "यह घर तो बिक गया। चाबी मेहता जी को देनी है।"
तभी मेहता जी अपनी बड़ी कार से वहां पहुंचे।
"नमस्कार माताजी। घर खाली हो गया ना? चाबी दीजिये, मुझे आज ही पूजा करवाकर काम शुरू करवाना है। इसे तुड़वाकर यहाँ कॉम्प्लेक्स बनेगा," मेहता ने रूखेपन से कहा।
रेवती देवी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। घर बिक चुका था। पैसा शिखा के किसी काम का नहीं था (फिलहाल)। और रहने के लिए उनके पास कोई छत नहीं थी। फ्लैट मिला नहीं, बेटी के घर जा नहीं सकते, और अपना घर रहा नहीं।
वे सड़क पर खड़े थे। बारिश तेज हो गई।
"राघव, कुछ कर!" रेवती देवी रोने लगीं। "हम कहाँ जाएंगे? मेहता जी, हमें कुछ दिन की मोहलत दे दीजिये।"
मेहता हंसे। "माताजी, व्यापार में मोहलत नहीं होती। आपने पैसे लिए हैं, घर मेरा है। निकलिए यहाँ से।"
राघव और शिखा लाचार खड़े थे। शिखा तो अपना सिर पकड़कर बैठ गई थी। जिस पैसे के लालच में उसने माँ का घर बिकवाया, वो पैसा अब उसके किसी काम का नहीं था और माँ सड़क पर आ गई थीं।
तभी सुमन, जो अभी तक चुपचाप खड़ी थी, आगे बढ़ी। वह भीगी हुई थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सा आत्मविश्वास था।
उसने मेहता जी के सामने वही लाल पोटली और बैंक के कागज़ात रख दिए जो उसने उस दिन निकाले थे।
"मेहता साहब," सुमन ने कड़क आवाज़ में कहा।
"ये क्या है?" मेहता ने पूछा।
"यह इस घर को वापस खरीदने का बयाना (Advance) है," सुमन ने कहा।
"क्या मज़ाक है? डील कैंसिल करने के लिए आपको मेरा दिया हुआ 50 लाख का एडवांस और ऊपर से 10 लाख पेनल्टी (Penalty) देनी होगी। कुल 60 लाख। क्या इसमें 60 लाख हैं?" मेहता ने हँसते हुए पूछा।
"इसमें 25 लाख हैं," सुमन ने कहा। "और बाकी के 35 लाख..." सुमन ने अपने पर्स से एक और चेक निकाला। "यह 35 लाख का चेक है।"
सब सन्न रह गए। राघव, रेवती और शिखा की आँखें फटी की फटी रह गईं। 35 लाख? सुमन के पास?
"यह किसका चेक है?" राघव ने पूछा।
"यह बाबूजी का इंश्योरेंस क्लेम है," सुमन ने खुलासा किया। "बाबूजी ने मरने से पहले एक पॉलिसी कराई थी, जिसका नॉमिनी उन्होंने मुझे बनाया था। उन्होंने कहा था, 'बहु, यह पैसा तब इस्तेमाल करना जब इस घर पर कोई बहुत बड़ी मुसीबत आए।' मैंने आज तक यह बात किसी को नहीं बताई थी क्योंकि मुझे डर था कि कहीं यह पैसा भी फिजूलखर्ची में न उड़ जाए। पर आज... आज वो वक्त आ गया है।"
सुमन ने मेहता जी के हाथ में चेक थमाया। "मेहता साहब, अपना एडवांस और पेनल्टी लीजिये और यह सौदा यहीं रद्द कीजिये। यह घर बिकाऊ नहीं है।"
मेहता ने चेक देखा, फिर सुमन के तेवर देखे। उसे अपने पैसे मिल रहे थे, ऊपर से 10 लाख का मुफ्त मुनाफा। उसने तुरंत चेक लिया और एग्रीमेंट के कागज़ फाड़ दिए।
"जैसी आपकी मर्जी भाभी जी। वैसे मानना पड़ेगा, घर की लक्ष्मी तो आप ही हैं," मेहता ने जाते-जाते कहा।
मेहता के जाते ही वहां सन्नाटा पसर गया। बारिश की बूंदें अब आंसुओं में बदल चुकी थीं।
रेवती देवी, जो कुछ देर पहले तक सुमन को गंवार और घर से निकालने के लिए उतावली थीं, अब अपनी नज़रों को उठा नहीं पा रही थीं। शिखा शर्म से पानी-पानी हो गई थी।
सुमन ने धीरे से जाकर घर का ताला खोला। "अंदर आइये माँजी, बारिश में भीग जाएंगी। यह आपका ही घर है।"
रेवती देवी दौड़कर आईं और सुमन के पैरों में गिर पड़ीं।
"बहु! मुझे माफ़ कर दे! मैं अंधी हो गई थी। अपनी बेटी के मोह में और शहर की चकाचौंध में मैंने यह नहीं देखा कि मैं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही हूँ। लोग कहते हैं कि बहुएं घर तोड़ती हैं, पर यहाँ तो मैं... एक माँ होकर घर तोड़ रही थी, और तूने... तूने एक बहु होकर उसे जोड़ लिया।"
सुमन ने सास को उठाया और गले लगा लिया। "माँजी, घर ईंटों से नहीं, घर की औरतों से बनता है। अगर आप नींव हैं, तो मैं दीवार हूँ। हम एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।"
शिखा भी पास आई, सर झुकाए हुए। "भाभी, मुझे माफ़ कर दो। मैंने अपने स्वार्थ के लिए आप सबको सड़क पर ला दिया था। आज अगर आप नहीं होतीं, तो हम कहीं के नहीं रहते।"
सुमन ने शिखा के आंसू पोंछे। "दीदी, पैसा तो आता-जाता रहता है। पर छत बार-बार नहीं मिलती। बाबूजी की आत्मा आज बहुत खुश होगी।"
राघव ने अपनी पत्नी को गर्व से देखा। आज उसे सुमन में एक साधारण गृहिणी नहीं, बल्कि एक रक्षक दिखाई दे रही थी।
उस रात 'शांति कुंज' में फिर से दीया जला। सामान वापस अपनी जगहों पर रखा गया। रेवती देवी ने कसम खाई कि अब वह कभी इस घर को छोड़ने की बात नहीं करेंगी। उन्होंने अपनी तिजोरी की चाबी, जो उन्होंने आज तक अपनी कमर से बांध कर रखी थी, निकालकर सुमन के हाथ में रख दी।
"अब से इस घर की मालिक मैं नहीं, तू है सुमन। क्योंकि जिसे घर बचाना आता है, वही घर चलाने के लायक है," रेवती देवी ने कहा।
सुमन मुस्कुराई। आंगन की तुलसी बारिश में धुलकर और भी हरी-भरी लग रही थी, बिल्कुल सुमन के रिश्ते की तरह।
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**लेखक का संदेश:**
दोस्तों, घर सिर्फ चार दीवारों से नहीं बनता, वह बनता है उसमें रहने वाले लोगों की समझ और त्याग से। अक्सर हम 'मॉडर्न' होने की होड़ में अपनी जड़ों को काट देते हैं। सुमन ने साबित कर दिया कि एक बहू सिर्फ दूसरे घर से आई हुई लड़की नहीं होती, वह उस घर की ढाल होती है। जब-जब परिवार पर संकट आता है, एक समझदार स्त्री ही उसे बिखरने से बचाती है, चाहे वह सास हो या बहू।
**अंत में आपसे एक सवाल:**
क्या रेवती देवी का घर बेचने का फैसला सही था? और क्या सुमन ने अपनी गुप्त बचत (बाबूजी का इंश्योरेंस) सही समय पर निकाली? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।
**"अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आँखों को नम किया, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसी ही दिल को छू लेने वाली मार्मिक और पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!"**
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