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ममता की वसीयत: खून के रिश्तों से बड़ा समर्पण

 देहरादून की एक शांत और पुरानी कॉलोनी में सावित्री देवी का पुश्तैनी मकान था। मकान क्या था, वह उनकी पूरी ज़िंदगी की यादों का एक जीता-जागता दस्तावेज़ था। इस घर के आँगन में उन्होंने अपने बेटे मयंक और बेटी विशाखा को खेलते और बड़े होते देखा था। लेकिन समय का पहिया ऐसा घूमा कि आज वह घर एक अजीब से सन्नाटे में डूबा रहता था। चार साल पहले एक सड़क हादसे में उनके इकलौते बेटे मयंक की मौत हो गई थी। मयंक के जाने के बाद सावित्री देवी पूरी तरह टूट चुकी थीं। लेकिन उस घने अंधेरे में उनका सहारा बनी उनकी विधवा बहू, प्रेरणा।

प्रेरणा की उम्र ही क्या थी, मुश्किल से अट्ठाईस साल। लोगों ने ताने मारे, रिश्तेदारों ने सलाह दी कि वह दूसरी शादी कर ले और अपनी ज़िंदगी बसा ले। लेकिन प्रेरणा ने सावित्री देवी का हाथ नहीं छोड़ा। उसने स्पष्ट कह दिया कि मयंक के जाने के बाद यह घर और उसकी माँ ही उसकी दुनिया हैं। सुबह उठकर सावित्री देवी को चाय देने से लेकर, उनके घुटनों की मालिश करने और रात को उनके सोने तक, प्रेरणा एक साये की तरह उनके साथ रहती। वह एक स्कूल में पढ़ाने जाती और लौटकर घर की सारी ज़िम्मेदारी संभालती। सावित्री देवी के लिए प्रेरणा अब बहू नहीं, बल्कि उनका बेटा बन चुकी थी।

वहीं दूसरी ओर सावित्री देवी की सगी बेटी विशाखा थी, जिसकी शादी मुंबई के एक बड़े बिजनेसमैन शशांक के साथ हुई थी। विशाखा साल में एकाध बार आती, दो-चार दिन रुकती और अपनी चमक-दमक भरी दुनिया में वापस लौट जाती। उसे कभी इस बात की परवाह नहीं रही कि उसकी बूढ़ी माँ किस हाल में है। लेकिन अचानक एक दिन विशाखा बिना बताए देहरादून आ पहुँची। इस बार उसके व्यवहार में एक अजीब सी मिठास थी। वह आते ही अपनी माँ के गले लगकर रोने लगी और बोली कि उसे अपनी गलती का एहसास हो गया है और अब वह अपनी माँ की सेवा करना चाहती है।

शुरुआत के दो दिन बहुत अच्छे बीते। लेकिन तीसरे दिन विशाखा ने अपना असली रंग दिखाना शुरू किया। उसने बातों ही बातों में सावित्री देवी से कहा, "माँ, यह घर बहुत पुराना और बड़ा है। तुम दोनों औरतों के लिए इसे संभालना बहुत मुश्किल है। प्रेरणा भी कब तक तुम्हारे साथ रहेगी? कल को अगर उसने दूसरी शादी कर ली, तो तुम्हारा क्या होगा? तुम ऐसा करो, इस घर को बेच दो। जो पैसे मिलेंगे, उससे प्रेरणा को कुछ हिस्सा देकर उसे मायके भेज दो और तुम मेरे साथ मुंबई चलो। मैं और शशांक तुम्हारी बहुत अच्छे से देखभाल करेंगे।"

सावित्री देवी ने जब यह सुना तो उनका दिल धक से रह गया। उन्होंने कहा, "बेटी, प्रेरणा मेरा घर छोड़कर कहीं नहीं जाएगी। उसने मुझे जीवनदान दिया है।" लेकिन विशाखा कहाँ मानने वाली थी। उसने धीरे-धीरे प्रेरणा को मानसिक रूप से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। जब सावित्री देवी सो रही होतीं, तो विशाखा प्रेरणा को ताने मारती, "तुम यहाँ सिर्फ मेरे पिता की जायदाद पर कब्ज़ा करने के लिए बैठी हो। मेरा भाई तो चला गया, अब तुम इस घर से क्यों चिपकी हो? तुम्हारा इस घर पर कोई हक़ नहीं है।" प्रेरणा चुपचाप आँसू पी जाती, लेकिन उसने सावित्री देवी से कभी कोई शिकायत नहीं की, क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि एक माँ और बेटी के रिश्ते में उसकी वजह से कोई दरार आए।

एक दोपहर विशाखा अपने साथ एक वकील और कुछ कागज़ात लेकर आई। उसने सावित्री देवी के सामने कागज़ रखते हुए कहा, "माँ, मैंने मुंबई में तुम्हारे लिए एक शानदार फ्लैट देखा है। तुम बस इन कागज़ों पर दस्तखत कर दो। यह इस घर की पावर ऑफ अटॉर्नी है। मैं इस घर को बेचकर सारा इंतज़ाम कर लूँगी। तुम्हें अब कोई चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।"

सावित्री देवी की आँखों पर उम्र का पर्दा था और बेटी के झूठे प्यार का भी। उनके हाथ कांप रहे थे। उन्होंने पेन उठा लिया था और वे दस्तखत करने ही वाली थीं। विशाखा के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान तैर गई थी। उसे लग रहा था कि उसकी चाल कामयाब हो गई है।

तभी घर के लैंडलाइन फोन की घंटी ज़ोर से बजी।

प्रेरणा ने दौड़कर फोन उठाया और कहा, "माँ जी, शशांक जीजाजी का फोन है।" सावित्री देवी ने पेन नीचे रखा और रिसीवर कान से लगाया।

"प्रणाम माँ जी," दूसरी तरफ से शशांक की भारी और गंभीर आवाज़ आई।

"जीते रहो बेटा, सब ठीक तो है?" सावित्री देवी ने पूछा।

शशांक ने एक गहरी साँस ली और कहा, "माँ जी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं शर्मिंदा हूँ कि विशाखा मेरी पत्नी है। उसने आपको जो कुछ भी बताया है, सब झूठ है। उसने मुंबई में कोई फ्लैट नहीं देखा है। असल में, विशाखा ने अपनी ऐशो-आराम की ज़िंदगी और किटी पार्टियों के शौक पूरे करने के लिए बाज़ार से लाखों का कर्ज़ ले रखा है। वह आपका घर बेचकर अपना कर्ज़ चुकाना चाहती है। उसका आपको मुंबई लाने का कोई इरादा नहीं है; वह आपको किसी वृद्धाश्रम में छोड़ने की योजना बना रही थी और प्रेरणा को घर से धक्के मारकर निकालने वाली थी। मुझे आज सुबह ही उसके लैपटॉप से ये सारी बातें पता चलीं। आप भूलकर भी किसी कागज़ पर दस्तखत मत कीजिएगा। मैं उसे सबक सिखाने के लिए आज ही देहरादून आ रहा हूँ।"

सावित्री देवी के हाथ से रिसीवर छूट गया। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिस बेटी पर उन्होंने भरोसा किया, वह उनके बुढ़ापे का सौदा करने आई थी और जिस बहू को दुनिया बेगानी कहती थी, वह उनका साया बनकर खड़ी थी।

विशाखा, जो अभी तक कागज़ों पर दस्तखत होने का इंतज़ार कर रही थी, उसने माँ का उतरा हुआ चेहरा देखा। तभी विशाखा का मोबाइल बजा। वह शशांक का ही कॉल था। शशांक ने फोन पर उसे इतनी ज़ोर से फटकार लगाई कि उसकी आवाज़ बिना स्पीकर के भी कमरे में गूँज रही थी। "विशाखा, अगर तुमने माँ जी के घर का एक तिनका भी हिलाया या प्रेरणा को परेशान किया, तो मैं तुम्हें तलाक दे दूँगा। तुम्हारी इस नीच हरकत के लिए मेरे घर में कोई जगह नहीं है। तुरंत माँ से माफी मांगो!"

विशाखा का सारा घमंड चूर-चूर हो गया। वह रोते हुए सावित्री देवी के पैरों में गिर पड़ी, "माँ, मुझे माफ़ कर दो। लालच ने मेरी आँखों पर पट्टी बाँध दी थी। शशांक बहुत गुस्से में हैं। अगर आप मुझे माफ़ नहीं करेंगी, तो मेरा घर टूट जाएगा।"

सावित्री देवी ने उसे उठाया नहीं। उनकी आँखों में आँसू थे, पर आवाज़ में एक दृढ़ता थी। उन्होंने कहा, "विशाखा, खून का रिश्ता होने से कोई अपना नहीं हो जाता। अपना वह होता है जो मुश्किल वक़्त में हाथ थामे। तूने मेरी ममता का और मेरे बुढ़ापे का जो मज़ाक बनाया है, उसके लिए मैं तुझे शायद कभी माफ़ न कर पाऊँ। लेकिन मैं शशांक की शुक्रगुज़ार हूँ, जिसने एक बेटे का फ़र्ज़ निभाया और मेरी आँखें खोल दीं।"

विशाखा अपना सा मुँह लेकर वहां से चली गई। उसी शाम सावित्री देवी ने वकील को वापस बुलाया। लेकिन इस बार कागज़ बेचने के नहीं, बल्कि नाम करने के थे। सावित्री देवी ने अपनी पूरी वसीयत और वह पुश्तैनी घर प्रेरणा के नाम कर दिया। उन्होंने प्रेरणा का हाथ थाम कर कहा, "आज से यह घर सिर्फ तेरा है। तूने एक बेटी से बढ़कर मेरा साथ दिया है। मेरे बाद तुझे इस दुनिया में किसी के आगे हाथ फैलाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।"

प्रेरणा रोती हुई सावित्री देवी के गले लग गई। उस दिन उस पुराने घर ने खून के रिश्तों पर सेवा और समर्पण की सबसे बड़ी जीत देखी थी।


दोस्तों, आपके अनुसार सावित्री जी ने अपनी सगी बेटी को जायदाद से बेदखल करके सारा घर प्रेरणा के नाम करके सही किया या उन्हें विशाखा को एक और मौका देना चाहिए था? अपने विचार कमेंट में ज़रूर बताएं।

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