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**काजल का वो कतरा: एक माँ का अदृश्य कवच**

 रौशनी से नहाए हुए उस विशाल बैंक्वेट हॉल में आज एक अलग ही रौनक थी। निहारिका के चचेरे भाई की सगाई का समारोह पूरे शबाब पर था। ढोलक की थाप और फिल्मी गीतों की धुनों के बीच जब निहारिका ने हॉल में कदम रखा, तो जैसे पल भर के लिए सबकी निगाहें उसी पर आकर ठहर गईं। उसने गहरे पन्ना-हरे रंग का एक भारी डिज़ाइनर लहँगा पहना था। उसके खुले लहरियेदार बाल, हल्की सी मुस्कान और चेहरे का वो निखार किसी भी देखने वाले को मंत्रमुग्ध करने के लिए काफी था। रिश्तेदारों से लेकर मेहमानों तक, हर कोई बस उसी की खूबसूरती के कसीदे पढ़ रहा था। कोई उसकी तुलना किसी अभिनेत्री से कर रहा था, तो कोई आपस में कानाफूसी कर रहा था कि 'लड़की तो बिल्कुल चाँद का टुकड़ा लग रही है'।


निहारिका इन सब तारीफों का पूरा आनंद ले रही थी। आखिर इस रूप को निखारने के लिए उसने घंटों पार्लर में बिताए थे। लेकिन उस भीड़ में एक नज़र ऐसी भी थी, जो उसकी सुंदरता पर गर्व तो कर रही थी, लेकिन साथ ही एक अनजाने डर से कांप भी रही थी। वो नज़र किसी और की नहीं, बल्कि उसकी माँ, सुमित्रा जी की थी।


सुमित्रा जी पिछले आधे घंटे से मेहमानों के बीच घूम-घूम कर यह महसूस कर रही थीं कि हर किसी की आँखें उनकी बेटी को ऐसे घूर रही हैं जैसे कोई कीमती चीज़ देख ली हो। सुमित्रा जी का दिल धक-धक कर रहा था। उनसे अब और बर्दाश्त नहीं हुआ। वह तेज़ी से भीड़ को चीरती हुई निहारिका के पास पहुँचीं। इससे पहले कि निहारिका अपनी सहेलियों के साथ एक और सेल्फी ले पाती, सुमित्रा जी ने उसका हाथ पकड़ा और लगभग खींचते हुए उसे हॉल के एक सुनसान कोने में, पर्दे के पीछे ले गईं।


"माँ! क्या कर रही हैं आप? मेरा हाथ दर्द कर रहा है," निहारिका ने अपनी कलाई छुड़ाते हुए झुंझलाकर कहा। 


सुमित्रा जी ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने जल्दी से अपनी उंगली अपनी आँख के किनारे पर रखी, थोड़ा सा काजल निकाला, और बिना एक पल गंवाए उसे निहारिका के कान के ठीक पीछे एक गहरे काले टीके के रूप में लगा दिया।


यह देखते ही निहारिका का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने तुरंत अपना फोन निकालकर फ्रंट कैमरा ऑन किया और अपने कान के पीछे देखने लगी। "उफ्फ माँ! ये क्या कर दिया आपने? आपको पता है इस मेकअप बेस को सेट करने में मुझे कितना वक्त लगा है? कहीं ये काजल पसीने से बहकर मेरी गर्दन पर फैल गया तो मेरी सारी तस्वीरें खराब हो जाएंगी। आप हमेशा ऐसे ही करती हैं!"


सुमित्रा जी ने एक गहरी सांस ली और अपनी बेटी को डांटते हुए, लेकिन एक कांपती हुई आवाज़ में कहा, "तुझे अपने मेकअप और तस्वीरों की पड़ी है निहारिका? तू देख नहीं रही कि बाहर हॉल में लोग तुझे कैसे घूर रहे हैं? लड़के वालों के यहाँ से जो रिश्तेदार आए हैं, उनकी आँखें तो तुझ पर से हट ही नहीं रही हैं। अभी तो तेरी शादी भी नहीं हुई है, मेरी बच्ची। इस दुनिया की नज़र बहुत ज़हरीली होती है। कहीं किसी की हाय न लग जाए तुझे, कहीं कोई बुरी साया मेरी फूल सी बच्ची पर न पड़ जाए।"


निहारिका ने अपनी माँ की इस दकियानूसी सोच पर गहरी आपत्ति जताते हुए कहा, "माँ, आप भी किन पुराने ज़माने की बातों में जी रही हैं। कोई नज़र-वज़र नहीं होती। लोग बस तारीफ कर रहे हैं क्योंकि मैंने ड्रेस अच्छी पहनी है। और आपके इस छोटे से काले टीके से कौन सा जादू हो जाएगा जो मुझे लोगों की नज़रों से बचा लेगा?"



सुमित्रा जी की आँखें अचानक भर आईं। उन्होंने निहारिका के गाल पर हाथ रखा और एक बहुत ही भारी स्वर में बोलीं, "तुझे लगता है कि यह सिर्फ एक अंधविश्वास है? तुझे वो दिन याद नहीं होगा, क्योंकि तू तब सिर्फ सात साल की थी। तेरे जन्मदिन पर मैंने तुझे एक लाल रंग की परी वाली फ्रॉक पहनाई थी। सबने तेरी इतनी तारीफ की थी, सबने तुझे इतना सराहा था। लेकिन उसी रात तुझे इतना तेज़ बुखार आया कि हफ्तों तक उतरा नहीं। तू बिस्तर से उठ नहीं पा रही थी। डॉक्टरों की दवाइयां काम नहीं कर रही थीं। मैं रात-रात भर तेरे सिरहाने बैठकर रोती थी। उस दिन मैंने मन्नत मांगी थी कि मेरी बच्ची के रूप को कभी किसी की नज़र न लगे। यह काला टीका कोई जादू नहीं है निहारिका, यह एक माँ की वो बेबसी और वो ढाल है, जो वो अपनी औलाद के लिए दुनिया से लड़कर बनाती है। मैं तेरा रूप नहीं बिगाड़ना चाहती, मैं बस अपने मन का डर मिटाना चाहती हूँ।"


माँ की आँखों से छलकते उन दो आंसुओं ने निहारिका के सारे गुस्से और उसकी आधुनिक सोच को पल भर में धो दिया। उसे अचानक एहसास हुआ कि जिसे वह अपना 'खराब होता मेकअप' समझ रही थी, वह दरअसल उसकी माँ का वो अथाह प्रेम था जो हर पल उसकी हिफाज़त के लिए तड़पता रहता है। वो काजल का कतरा कोई दाग नहीं था, बल्कि माँ की दुआओं का एक सुरक्षा चक्र था। 


निहारिका का दिल भर आया। उसने अपनी माँ के दोनों हाथों को अपने हाथों में लिया और उन्हें चूम लिया। "मुझे माफ कर दीजिए माँ। मैं सच में बहुत नासमझ हूँ। मेरे लिए यह मेकअप बहुत ज़रूरी था, लेकिन मैं भूल गई थी कि आपके लिए मेरी सलामती से बढ़कर दुनिया में कुछ नहीं है।" निहारिका ने अपनी माँ को कसकर गले से लगा लिया।


सुमित्रा जी ने मुस्कुराते हुए अपनी बेटी की पीठ थपथपाई। कुछ देर बाद जब निहारिका वापस हॉल में गई, तो उसकी एक सहेली ने टोकते हुए कहा, "यार निहारिका, तेरे कान के पीछे थोड़ा काजल लगा हुआ है, उसे पोंछ ले।"


निहारिका ने बहुत ही गर्व से मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "नहीं यार, इसे रहने दे। यह मेरी खूबसूरती का कोई दाग नहीं है, यह तो मेरी माँ का आशीर्वाद है जो मुझे दुनिया की हर बुरी नज़र से बचाता है।" उस रात निहारिका की खूबसूरती में मेकअप से ज़्यादा, माँ के उस प्यार के टीके की चमक नज़र आ रही थी।


क्या आपको भी कभी किसी खास मौके पर आपकी माँ ने ऐसे ही काला टीका लगाया है? उस वक्त आपको कैसा महसूस हुआ था और आज आप उस बारे में क्या सोचते हैं? अपने अनुभव और अपनी माँ की ऐसी ही प्यारी यादें हमारे साथ कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें। हमें आपके जवाब का इंतज़ार रहेगा!


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