रसोई की खिड़की से आती सुबह की धूप नीता के थके हुए चेहरे पर पड़ रही थी। चूल्हे की आँच और लगातार काम की वजह से उसके माथे से पसीने की बूंदें छलक रही थीं। शादी को छह साल बीत चुके थे, और इन छह सालों में नीता ने इस घर को अपने खून-पसीने से सींचा था। शादी के अगले ही दिन से उसकी सासू माँ, सुशीला देवी ने घर की चाबियों के साथ-साथ ज़िम्मेदारियों का पूरा बोझ नीता के कंधों पर डाल दिया था और खुद को पूजा-पाठ व आराम तक सीमित कर लिया था।
नीता का पति, अभिनव, एक बड़े ऑफिस में मैनेजर था। वह नीता को सिर्फ एक ऐसी 'सुविधा' मानता था जो उसकी हर जरूरत को बिना मांगे पूरा कर दे। कभी प्यार के दो मीठे बोल या उसकी थकान पूछने का समय अभिनव के पास नहीं था। ज़रूरत पड़ने पर थोड़ा लाड़-प्यार दिखा देना, वरना पूरे दिन नीता की कोई अहमियत नहीं थी।
आज सुबह से ही घर का माहौल गरम था। नाश्ते में नमक थोड़ा कम क्या हो गया, सुशीला देवी ने आसमान सिर पर उठा लिया। "पता नहीं मायके से क्या सीख कर आई है! छह साल हो गए, आज तक ढंग से दाल में नमक डालना नहीं आया। बस दिन भर महारानी की तरह घूमती रहती है।"
नीता, जो सुबह पाँच बजे से मशीन की तरह काम कर रही थी, आज खुद को रोक नहीं पाई। उसने धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज़ में कह दिया, "माँ जी, अगर नमक कम था तो आप ऊपर से ले सकती थीं। मैं सुबह से दोनों बच्चों का टिफिन, अभिनव का नाश्ता और आपके लिए अलग से दलिया बना रही हूँ। कभी तो मेरी मेहनत देख लिया कीजिए।"
नीता का इतना कहना था कि डाइनिंग टेबल पर बैठे अभिनव का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह अपनी माँ के सामने पत्नी का यह जवाब बर्दाश्त नहीं कर सका। अभिनव चिल्लाया, "नीता! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई माँ को पलट कर जवाब देने की? आजकल तुम्हारी ज़बान बहुत चलने लगी है।"
तभी दरवाजे की घंटी बजी। नीता के दोनों भाई, विकास और सुमित, शहर में किसी काम से आए थे और बहन से मिलने पहुंच गए थे। दरवाज़ा खुला तो उन्होंने सीधे अभिनव की डांट और सुशीला देवी के ताने सुने।
अभिनव अपने साले विकास को देखकर भी शांत नहीं हुआ, बल्कि अपना गुस्सा उन पर उतारने लगा। "आओ विकास, देखो अपनी बहन के कारनामे। शिकायत का क्या, जब देखो तब बहस करने को तैयार खड़ी रहती है तुम्हारी बहन। पता नहीं क्या सिखाकर भेजा है तुम लोगों ने इसे। बड़ों का ज़रा भी अदब नहीं है।"
विकास अपनी बहन की उतरी हुई सूरत और डबडबाई आँखें देखकर अंदर तक तिलमिला उठा। वह अपनी बहन की रग-रग से वाकिफ था। विकास ने गहरी साँस ली और अभिनव की आँखों में आँखें डालते हुए, सख्त लेकिन संयमित स्वर में बोला,
"जीजा जी, मेरी बहन पढ़ी-लिखी और समझदार है। उसने कभी किसी काम से मुँह नहीं मोड़ा। जिस दिन से वह इस घर में आई है, उसने अपनी खुशियाँ भूलकर हर तरह से आप लोगों की सेवा की। फिर भी आप लोग हमेशा उसके पीछे हाथ धोकर पड़े रहते हैं। क्या उसका इस घर में इंसान होने का कोई हक नहीं है?"
अभिनव अपनी इस बेइज्जती पर भड़कने ही वाला था कि तभी छोटा भाई सुमित भी आगे आ गया। सुमित ने अभिनव को टोकते हुए कहा, "जीजा जी, आप शायद भूल रहे हैं कि नीता कोई बेसहारा नहीं है। और रही बात लड़की वालों की, तो आजकल वे भी अपना और अपनी बेटी का स्वाभिमान बचाना और उसके लिए लड़ना बहुत अच्छी तरह जानते हैं। हम अपनी बहन को यहाँ आपके ताने और गालियाँ सुनने के लिए नहीं छोड़ सकते।"
सुशीला देवी ने बीच-बचाव करते हुए तंज कसा, "देखो, कैसे सीना तान कर खड़े हैं। हमने तो बस इतना कहा कि बहू को पलट कर जवाब नहीं देना चाहिए।"
विकास ने तुरंत सुशीला देवी की तरफ मुड़कर कहा, "बिना वजह कोई बहस नहीं करता, माँ जी। जब किसी इंसान को दीवार से लगा दिया जाए, तो वह भी बोल उठता है। जीजा जी, क्या आप भूल गए? अभी एक महीने पहले ही जब आपको गंभीर टाइफाइड हुआ था, तब नीता ने अपनी परवाह किए बिना रात-दिन आपकी सेवा की थी। अपना खाना-पीना भूलकर वह आपके सिरहाने बैठी रही। क्या तब उसकी ज़बान चलती थी? फिर भी आप उस पर झूठे आरोप लगाते रहते हैं। वह कोई मशीन नहीं, हाड़-मांस की इंसान है। दो बच्चों, आपके और पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी उसके अकेले के कंधों पर है। क्या कभी आपने उससे पूछा है कि वह थकती है या नहीं?"
विकास के इन शब्दों ने कमरे में सन्नाटा ला दिया। अभिनव के पास कोई जवाब नहीं था। उसे सचमुच वो रातें याद आ गईं जब बुखार से तपते हुए उसे सिर्फ नीता का ही सहारा था। सुशीला देवी भी नज़रें चुराने लगीं, क्योंकि वे जानती थीं कि बीमारी के वक्त वे खुद भी अभिनव के कमरे में जाने से कतराती थीं।
नीता अपने भाइयों को यूं अपने स्वाभिमान के लिए ढाल बनकर खड़ा देख फफक कर रो पड़ी। आज तक उसने यह सोचकर सब साहा था कि लड़की का तो मुकद्दर ही यही होता है। लेकिन आज उसके भाइयों ने उसे अहसास कराया कि उसका समर्पण उसकी कमजोरी नहीं है।
सुमित ने नीता के कंधे पर हाथ रखा और कहा, "दीदी, तुम अपना सूटकेस पैक करो। जो परिवार तुम्हारे समर्पण की कद्र नहीं कर सकता, वहाँ तुम्हें घुट-घुट कर जीने की ज़रूरत नहीं है।"
यह सुनकर अभिनव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे समझ आ गया कि अगर नीता चली गई, तो इस घर का वजूद ही बिखर जाएगा। उसका सारा अहंकार टूट गया। उसने आगे बढ़कर विकास का हाथ पकड़ लिया, "विकास, मुझे माफ़ कर दो। तुम सही कह रहे हो। मैंने और माँ ने हमेशा नीता के काम को उसकी ज़िम्मेदारी मानकर उसकी कोई कद्र नहीं की। मैं वादा करता हूँ कि आज के बाद नीता को इस घर में वो सम्मान मिलेगा, जिसकी वह असल हकदार है।"
नीता रुकी, क्योंकि वह घर तोड़ना नहीं, बल्कि उस घर में अपना सम्मान वापस पाना चाहती थी। आज उसके भाइयों ने उसके मूक समर्पण को एक आवाज़ दे दी थी।
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