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तृप्त

 मम्मी ये तृप्ति कया होती हैं ....छोटीसी आराध्या ने उत्सुकतावश सुधा से पूछा जो रसोईघर में रोटियां सेंक रही थी..

तृप्ति..... आराध्या वो तो आप अपने पापा जी से पूछो ...

अखबार पढ रहे मोहन की ओर इशारा करते हुए सुधा बोली ....

पापा ....पापा ...आप ही बताइए ना ये तृप्ति कया होती है

अरे वाह....आज हमारी आराध्या को तृप्ति के बारे मे जानने की इतनी उत्सुकता कयो है हमें भी तो पता चले ...मोहन अखबार को एक ओर रखकर आराध्या को अपने पास बिठाते हुए बोला....

बताइए ना....आज आँनलाइन क्लास में टीचर ने कहा आप बच्चों को ऐसे पढते हुए देखकर मुझे तृप्ति मिलती हैं ....मुझे कुछ समझ नहीं आया वो वहां इतनी दूर और मोबाइल फोन पर कोई उन्हें कुछ दे नहीं सकता तो तृप्ति उन्हें किसने दी ....

हा....हा....आराध्या.... बेटा उनके कहने का मतलब था उन्हें आप बच्चों को पढाकर आपकी पढाई का हर्जाना ना होते देखकर खुशी एक सुखद सुकून मिला....

आराध्या ने एकबारगी फिर से पापा की ओर देखा....

नहीं समझी ....देखो इतनी गर्मी में भी आपकी मम्मी आपके लिए मेरे लिए खाना बना रही हैं और हमारे स्वाद के साथ साथ स्वास्थ्य का भी ध्यान रखती हैं अब सोचो वह ऐसा कयुं करती हैं कयोंकि अपनों को खुश देखकर हमारे मन को शांति मिलतीं है एक सुखद अनुभव एक सुकून मिलता है उसी को तृप्ति कहते है .....

आराध्या समझने की कोशिश कर रही थी ....

इतनी सी बात नहीं समझी ....सुधा आराध्या की ओर मुस्कुरा कर बोली....

समझ जाएगी ....जिंदगी स्वयं ये शब्दों के मायने समझाती है सुधा .....बच्चों को शब्द भी तभी समझ आते है जब वह उन्हें प्रयोग करने लगते है देखना इसे भी जल्दी तृप्ति का सही और सटीक मतलब समझ आ जाएगा....

आप भी ना...चलिए खाना खाइए और तुम भी आराध्या.....कहकर सुधा हंसते हुए रसोईघर से और रोटियां लेने चली गई...

शाम को ....

सुनो बाजार जा रहा हूं कुछ चाहिए तो कहो ....

अरे रुकिए ....मे भी चलती हूं जरूरत का समान लाना है ...

मम्मी मे भी जाऊंगी.....

हा....चल जल्दी.....

तीनों स्कूटी लिए बाजार पहुंच गए ....सुधा ने अपनी घरेलू जरुरतों के मुताबिक समान खरीदा और वापस आकर स्कूटी की डिग्गी मे रख दिया....

पापा आम..... पापा.... आराध्या आमों की रेहड़ी देखकर बोली.....

लो अभी कल तो खाएं थे आरू ....

अरे लेने दो मेरी बिटिया को आम पसंद है तो हम आराध्या के लिए आम लेते है ....

कैसे दिए भैया ....

बाबूजी सौ के दो किलो ....

मोहन आम छांटने लगा .....तभी उसकी नजरे आराध्या की ओर गई जो वहीं एक दुकान के आगे एक बनी थडी पर बैठी बुजुर्ग को देख रही थी.....

कया हुआ आराध्या.....

पापा..... मुझे लगता है उन दादी को भी मेरी तरह आम पसंद है देखिए ना ....

मोहन ने उस और देखा तो सचमुच एक बुजुर्ग महिला ललचाई नजरों से आमों को देख रही थी मोहन मुस्कुरा पडा....मोहन ने आमों को तुलवाया और आराध्या सहित आमों की थैली को लेकर बुजुर्ग महिला तक पहुंचा....

राम राम अम्माजी..... आम खाएगी आप....

आम....बुजुर्ग महिला ने मोहन की ओर हैरानी से देखा....

दादीमां ....पापा कह रहे है आप आम खाओगी....

मन तो है बेटा पर ....मेरे पास पैसे नहीं है.....पहले मेरा बेटा लाकर दे देता था मगर ....वो दूसरे शहर गया अबतक नहीं लौटा...

मोहन ने आम निकालकर कहा.... पैसे नहीं चाहिए एक बेटा मां को आम खिलाना चाहता है लीजिए खाकर देखिए .....

बुजुर्ग ने आम लिया और तुरंत चूसने लगी .....

वह जल्द से जल्द आम खा लेना चाहती थी ......

मोहन आराध्या उन्हें हंसते हुए देख रहे थे ...मोहन जैसे ही वापसी की ओर चलने लगा तो आराध्या बोली ....पापा एक आम और दो ना....

मोहन ने थैली में से एक आम और निकालकर आराध्या को दिया आराध्या मुडकर बुजुर्ग की ओर गई....

दादीमां..... लो...

नहीं बिटिया बस .....

ले लो दादीमां ....आपको खाते हुए देखकर मुझे तृप्ति मिल रही है आपकी पोती देती तो आप मना करती नहीं ना ...लीजिए....

बुजुर्ग ने आम पकड तो लिया मगर उनकी दोनों आँखें भीगी हुई थी अचानक आम के रस से भरे हाथों को उठाकर वह बोली ....जुग जुग जियो .....ईश्वर तुम्हें सभी खुशियों से हंसता हुआ रखे ....सचमुच आज तुमने मुझे भी तृप्त कर दिया....

आराध्या ने पापा की ओर देखा ....जोकि मुस्कुरा रहे थे ...वहीं दूसरी ओर खडी सुधा भी खुशी से दोनों की ओर देखकर कह रही थी सच ही कह रहे थे आप मोहनजी ....ईश्वर ऐसे खेल रचता है जो हमें समझाने के लिए होता है उन शब्दों का सही और सटीक मतलब बता देता है ....


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