"मेरे तो अपने माँ-बाप बचपन में ही चल बसे थे। मौसा-मौसी ने ही मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया, लेकिन एक माँ के आँचल की जो कमी थी, वह हमेशा मेरे दिल में एक नासूर की तरह चुभती रही। मैंने हमेशा यही सपना देखा था कि जब भी मेरी शादी होगी, तो मैं अपनी सास में अपनी माँ को और ससुर में अपने पिता को ढूँढूँगी। पर आज मुझे बहुत डर लग रहा है। क्या तुम्हारा परिवार इस बिन माँ-बाप की लड़की को कभी अपने दिल से अपना पाएगा?" मंदिर की सीढ़ियों से उतरते हुए अंजलि ने अपने आंसुओं को पोंछते हुए कहा।
उसके पास खड़े समीर ने उसका कांपता हुआ हाथ अपने मजबूत हाथों में थाम लिया। उसने अंजलि की डरी हुई आँखों में झांकते हुए बड़ी नरमी से कहा, "अंजलि, तुम इतनी पवित्र और निस्वार्थ हो कि पत्थर दिल इंसान भी तुम्हें अपना ले। मैंने देखा है कि तुम अनजान लोगों की मदद करने में भी कभी पीछे नहीं हटतीं। फिर मेरे घरवाले तो अब तुम्हारे अपने हुए। मेरी माँ थोड़ी सख्त जरूर हैं, लेकिन उनका दिल बहुत साफ है। जब वो तुम्हारा ये निश्छल प्यार देखेंगी, तो तुम्हें अपनी बेटी से भी बढ़कर मानेंगी। तुम बिल्कुल मत डरो। और तुम्हारे मौसा-मौसी को भी हम धीरे-धीरे मना ही लेंगे। अब चलो, एक नई शुरुआत करते हैं।"
इतना कहकर समीर ने अंजलि का हाथ पकड़ा और उसे लेकर अपने घर की ओर चल पड़ा। अंजलि के दिल की धड़कनें तेज थीं। जब समीर ने अपने घर के दरवाजे की घंटी बजाई, तो अंजलि ने घबराहट में अपनी लाल चुनरी को मुट्ठी में कस लिया।
दरवाजा समीर की माँ, शकुंतला देवी ने खोला। सामने अपने इकलौते बेटे और एक अनजान लड़की के गले में वरमाला और लड़की की माँग में गहरा लाल सिंदूर देखकर शकुंतला देवी के पैरों तले जमीन खिसक गई। उनका चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। इससे पहले कि समीर कुछ कह पाता, शकुंतला देवी का गुस्सा ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा।
"ये सब क्या है समीर? इस लड़की को तू कहाँ से उठा लाया है? और ये तमाशा कैसा है?" शकुंतला देवी ने चीखते हुए पूछा।
"माँ, ये अंजलि है। हम दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं और हमने मंदिर में शादी कर ली है। प्लीज माँ, इसे आशीर्वाद दीजिए," समीर ने हाथ जोड़कर कहा।
शकुंतला देवी ने अंजलि को ऊपर से नीचे तक घृणा भरी नजरों से देखा और खरी-खोटी सुनानी शुरू कर दी। "आशीर्वाद? और इस सड़क छाप लड़की को? जिसके आगे-पीछे कोई नहीं, जिसके कोई संस्कार नहीं, उसे मैं अपने खानदान की बहू मान लूँ? अनाथ है तू, अनाथ! अपने माँ-बाप का प्यार तो मिला नहीं, चली है मेरे सीधे-सादे बेटे को फँसाकर इस घर की मालकिन बनने! सुन ले कान खोलकर, इस घर में तेरे लिए कोई जगह नहीं है।"
अंजलि के लिए शकुंतला देवी के शब्द किसी जहरीले तीर की तरह थे। वह जिस माँ के प्यार की आस लेकर आई थी, उसी माँ ने उसके अनाथ होने का ऐसा क्रूर मजाक उड़ाया था कि उसकी आत्मा तक छलनी हो गई। समीर ने अपनी माँ को रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन अंजलि ने समीर का हाथ पकड़कर उसे शांत रहने का इशारा किया। वह रोती रही, लेकिन उसने पलटकर एक शब्द भी नहीं कहा।
समीर की जिद के आगे शकुंतला देवी को उन्हें घर में घुसने तो देना पड़ा, लेकिन उन्होंने अंजलि को अपनी बहू मानने से साफ इनकार कर दिया। घर में अंजलि की हैसियत एक नौकरानी से भी बदतर हो गई। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक वह घर के सारे काम करती, शकुंतला देवी की हर कड़वी बात चुपचाप सुनती, लेकिन कभी उफ तक नहीं करती। वह उन्हें समय पर चाय देती, उनकी दवाइयों का ध्यान रखती, लेकिन बदले में उसे सिर्फ दुत्कार ही मिलती। समीर जब भी अंजलि का पक्ष लेने की कोशिश करता, अंजलि उसे रोक देती और कहती, "माँ हैं वो तुम्हारी। उनके गुस्से में भी मुझे अपनापन लगता है। एक दिन मेरा प्यार उनकी नफरत को जरूर जीत लेगा।"
वक्त अपनी रफ्तार से गुजरता रहा। छह महीने बीत गए, लेकिन शकुंतला देवी का बर्ताव नहीं बदला। फिर एक दिन अचानक शकुंतला देवी को तेज बुखार और सीने में इन्फेक्शन हो गया। उनकी हालत इतनी बिगड़ गई कि उन्हें बिस्तर पकड़ना पड़ा। समीर उन दिनों ऑफिस के किसी बहुत जरूरी काम से शहर से बाहर गया हुआ था। घर के बाकी रिश्तेदार और पड़ोसी बीमारी के डर से दूर ही रहे।
ऐसी मुश्किल घड़ी में अंजलि उनकी परछाई बन गई। वह दिन-रात उनके सिरहाने बैठी रहती। ठंडे पानी की पट्टियां रखती, उन्हें अपने हाथों से सूप पिलाती और रात-रात भर जागकर उनके पैरों की मालिश करती। शकुंतला देवी बुखार की बेहोशी में भी महसूस कर रही थीं कि कोई बहुत ही कोमल हाथ उनके दर्द को सहला रहा है।
तीन दिन बाद जब शकुंतला देवी का बुखार उतरा और उन्होंने अपनी आंखें खोलीं, तो उन्होंने देखा कि अंजलि जमीन पर उनके पलंग के पास ही सिर रखकर सोई हुई है। उसकी आंखों के नीचे काले घेरे पड़ गए थे और वह बहुत कमजोर लग रही थी। शकुंतला देवी का कठोर हृदय एक पल में पिघल गया। उन्हें अपनी वे सारी गालियां और ताने याद आने लगे जो उन्होंने इस मासूम लड़की को दिए थे। जिस लड़की को उन्होंने अनाथ और लालची कहा था, उसी लड़की ने एक सगी बेटी से बढ़कर उनकी जान बचाई थी।
अचानक अंजलि की आंख खुली। शकुंतला देवी को होश में देखकर वह घबराकर उठी और बोली, "माँ जी, आपको कुछ चाहिए? पानी दूँ?"
शकुंतला देवी की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। उन्होंने अपने कांपते हुए हाथ आगे बढ़ाए और अंजलि को कसकर अपने सीने से लगा लिया। "मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची। मैं कितनी अंधी हो गई थी झूठी शान के गुरूर में। तू अनाथ नहीं है, आज से तू मेरी सगी बेटी है। मैंने तुझे घर से निकालना चाहा, और तूने मुझे मौत के मुंह से निकाल लिया।"
अंजलि भी फूट-फूट कर रोने लगी। लेकिन आज उसके ये आंसू दुख के नहीं, बल्कि उस बरसों पुरानी प्यास के बुझने के थे। आज उसे सिर्फ शकुंतला देवी के रूप में एक सास ही नहीं मिली थी, बल्कि वह माँ मिल गई थी जिसके लिए उसका दिल बचपन से तरसता था।
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