शादी की शहनाइयों की गूंज शांत हुए अभी बमुश्किल एक साल ही बीता था कि घर के माहौल में एक अजीब सी खामोशी और तनाव ने जगह बना ली थी। सुमेधा और राघव की शादी बहुत ही धूमधाम से हुई थी। सुमेधा एक बहुत ही होनहार और पढ़ने-लिखने वाली लड़की थी, लेकिन ससुराल आते ही उस पर एक आदर्श बहू बनने का दबाव पड़ने लगा। राघव की माँ, सरला देवी, पुराने खयालात की महिला थीं। उन्हें अपनी बहू से बस यही उम्मीद थी कि वह घर का कामकाज संभाले और जल्द से जल्द उनके आँगन में किसी पोते या पोती की किलकारियां गूंजने लगें। शादी की पहली सालगिरह के दिन ही सरला देवी ने बातों-बातों में सुमेधा को ताना मारते हुए कह दिया था कि उनके साथ की औरतों के घर में बच्चों के खिलौने आ चुके हैं, और उनका घर अभी तक सूना है।
सुमेधा यह सुनकर अंदर ही अंदर सहम गई। वह अभी अपनी मास्टर डिग्री (एम.ए.) की पढ़ाई पूरी कर रही थी। उसका ध्यान अपनी किताबों और आने वाली परीक्षाओं पर था। लेकिन तभी राघव, जो अपनी माँ की बातों को चुपचाप सुन रहा था, सुमेधा के बचाव में एक ढाल बनकर खड़ा हो गया। उसने अपनी माँ को बड़े ही शांत लेकिन दृढ़ स्वर में समझाया कि सुमेधा अभी अपनी पढ़ाई कर रही है और जब तक उसकी डिग्री पूरी नहीं हो जाती, वे दोनों बच्चे के बारे में कोई विचार नहीं करेंगे। सरला देवी को अपने बेटे का यह जवाब बिल्कुल पसंद नहीं आया, लेकिन राघव के स्पष्ट रुख को देखकर वे मन मसोस कर रह गईं।
राघव का साथ पाकर सुमेधा का हौसला कई गुना बढ़ गया। उसने अपनी पूरी ऊर्जा अपनी पढ़ाई में झोंक दी। जब एम.ए. का परिणाम आया, तो पूरे विश्वविद्यालय में सुमेधा ने स्वर्ण पदक हासिल किया। इस सफलता ने सुमेधा के भीतर दबे एक बहुत बड़े सपने को फिर से जगा दिया। उसने एक शाम राघव के साथ छत पर टहलते हुए डरते-डरते अपने दिल की बात कही। सुमेधा ने बताया कि वह आईएएस (UPSC) की परीक्षा देना चाहती है और एक प्रशासनिक अधिकारी बनकर समाज के लिए कुछ करना चाहती है। राघव ने जब अपनी पत्नी की आँखों में इस सपने की चमक देखी, तो उसे ज़रा भी ऐतराज नहीं हुआ। बल्कि, उसकी आँखों में सुमेधा के लिए गर्व और बढ़ गया।
राघव ने तुरंत शहर के सबसे प्रतिष्ठित और महंगे कोचिंग सेंटर में सुमेधा का दाखिला करवा दिया। किताबें, स्टडी मटेरियल, लैपटॉप—सुमेधा को जिस चीज़ की भी ज़रूरत थी, राघव ने बिना कुछ कहे लाकर रख दी। लेकिन जैसे ही यह बात सरला देवी और बाकी रिश्तेदारों को पता चली, घर में जैसे भूचाल आ गया।
"अरे, शादीशुदा औरतें कहीं अफसर बनती हैं क्या? घर कौन संभालेगा? इसका दिमाग खराब हो गया है और तुमने इसे सिर पर चढ़ा रखा है!" सरला देवी ने राघव से तीखे शब्दों में कहा। आस-पड़ोस की औरतें भी आग में घी डालने का काम कर रही थीं। "अरे सरला बहन, बहू को इतनी छूट दोगी तो कल को वह तुम्हें ही आँखें दिखाएगी। अफसर बन गई तो पति को कुछ नहीं समझेगी।" ये ताने रोज़मर्रा की बात हो गए थे। लेकिन राघव ने इन सब बातों को कभी सुमेधा तक पहुँचने नहीं दिया। वह खुद ऑफिस से आने के बाद घर के छोटे-मोटे कामों में मदद करता ताकि सुमेधा को पढ़ने का ज्यादा समय मिल सके।
सुमेधा पर पढ़ाई के साथ-साथ खुद को साबित करने का भी बहुत बड़ा मानसिक दबाव था। वह दिन-रात एक करके पढ़ती रही। लेकिन जब पहले प्रयास का परिणाम आया, तो सुमेधा प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) भी पास नहीं कर पाई।
परिणाम आते ही घर में जैसे तानों की झड़ी लग गई। सरला देवी ने व्यंग्य कसते हुए कहा, "देख लिया कलेक्टर साहिबा का नतीजा! मैंने तो पहले ही कहा था कि औरतों की असली परीक्षा रसोई में होती है, किताबों में नहीं। अब बहुत हो गया यह नाटक। उम्र बीती जा रही है, अब घर बसाने और बच्चे पैदा करने पर ध्यान दो।"
सुमेधा अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थी। उसने अपनी सारी किताबें समेट कर अलमारी में बंद कर दीं और रोते हुए राघव से कहा, "शायद माँ जी सही कह रही हैं। यह सब मेरे बस का नहीं है। मैं तुम्हारा पैसा और समय दोनों बर्बाद कर रही हूँ। मुझे छोड़ देना चाहिए।"
राघव ने सुमेधा के आंसू पोंछे और उसे अपने गले से लगा लिया। उसने कहा, "सुमेधा, क्या तुमने यह सपना लोगों के ताने सुनने के लिए देखा था? असफलता तो सफलता की पहली सीढ़ी है। अगर तुम अभी हार मान लोगी, तो उन लोगों की बातें सच साबित हो जाएंगी जो कहते हैं कि लड़कियां शादी के बाद कुछ नहीं कर सकतीं। मुझे तुम पर खुद से ज्यादा भरोसा है। अलमारी खोलो और फिर से शुरू करो।"
राघव के इन शब्दों ने सुमेधा के भीतर बुझती हुई आग को फिर से भड़का दिया। उसने एक बार फिर किताबें उठाईं। इस बार मेहनत दोगुनी थी और एकाग्रता भी। लेकिन किस्मत को शायद उसका और कड़ा इम्तिहान लेना था। दूसरे प्रयास में सुमेधा ने प्रारंभिक परीक्षा और मुख्य परीक्षा (Mains) तो पास कर ली, लेकिन इंटरव्यू के बाद फाइनल लिस्ट में उसका नाम नहीं आया।
यह हार पहले से भी ज्यादा दर्दनाक थी। वह मंज़िल के इतने करीब पहुँच कर वापस लौट आई थी। घर वालों का दबाव अब अपने चरम पर था। रिश्तेदारों ने कहना शुरू कर दिया था कि राघव अपनी पत्नी के पीछे पागल हो गया है। सरला देवी ने तो राघव से साफ कह दिया था कि अगर इस बार सुमेधा ने यह पढ़ाई नहीं छोड़ी, तो वह यह घर छोड़कर चली जाएंगी। सुमेधा इस बार इतनी ग्लानि में थी कि उसने खाना-पीना तक छोड़ दिया। उसे लगने लगा था कि उसकी वजह से राघव के घर की शांति भंग हो रही है।
लेकिन राघव किसी चट्टान की तरह सुमेधा के साथ खड़ा रहा। उसने अपनी माँ से विनती की कि वे सुमेधा को सिर्फ एक आखिरी मौका दें। राघव ने सुमेधा को समझाया, "तुम इंटरव्यू तक पहुँची हो सुमेधा! तुम लाखों लोगों से आगे निकल चुकी हो। यह तुम्हारे पीछे हटने का नहीं, बल्कि आखिरी छलांग लगाने का वक्त है।"
सुमेधा ने अपने पति की आँखों में अपने लिए जो अटूट विश्वास देखा, उसने उसके सारे डर खत्म कर दिए। तीसरे प्रयास के लिए सुमेधा ने खुद को दुनिया से पूरी तरह काट लिया। राघव ने घर के बाहर वालों का आना-जाना कम कर दिया। उसने सुमेधा को हर उस नकारात्मक बात से बचाया जो उसका मनोबल तोड़ सकती थी। रात-रात भर जब सुमेधा पढ़ती, तो राघव उसके पास बैठकर अपना ऑफिस का काम करता या उसे कॉफी बनाकर देता। उन दोनों ने मिलकर इस परीक्षा को सिर्फ एक चुनौती नहीं, बल्कि अपने प्यार और विश्वास का एक महासंग्राम बना लिया था।
आखिरकार, वह दिन आ ही गया जिसका उन दोनों को बेसब्री से इंतज़ार था। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) का फाइनल परिणाम घोषित होने वाला था। सुमेधा डर के मारे कंप्यूटर स्क्रीन नहीं देख पा रही थी। उसकी धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि उसे अपनी आवाज़ सुनाई दे रही थी। राघव ने कांपते हाथों से पीडीएफ खोली और सर्च बॉक्स में 'सुमेधा शर्मा' टाइप किया।
राघव की आँखें फटी की फटी रह गईं। स्क्रीन पर लिखा था— 'रैंक 28'।
राघव ने सुमेधा को ज़ोर से गले लगा लिया और खुशी से चिल्ला उठा, "तुमने कर दिखाया सुमेधा! तुम आईएएस बन गईं! ऑल इंडिया रैंक 28!" सुमेधा फूट-फूट कर रोने लगी। यह आंसू पिछले तीन सालों के उस दर्द, तानों और संघर्ष के थे जो आज बहकर बाहर निकल रहे थे।
राघव सुमेधा का हाथ पकड़कर दौड़ते हुए अपनी माँ के कमरे में गया। जब सरला देवी ने सुना कि उनकी बहू अब एक बड़ी अफसर बन गई है, तो उन्हें अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। थोड़ी ही देर में आस-पड़ोस के लोग, जो कल तक ताने मारते थे, आज फूल-मालाएं और मिठाइयां लेकर उनके दरवाज़े पर खड़े थे। सब कह रहे थे, "सरला जी, आपकी बहू ने तो पूरे जिले का नाम रोशन कर दिया।"
सरला देवी का अहंकार आज अपनी ही बहू की कामयाबी के आगे टूट गया था। उनकी आँखों से पश्चाताप और खुशी के आंसू बहने लगे। उन्होंने आगे बढ़कर सुमेधा को सीने से लगा लिया और रोते हुए कहा, "मुझे माफ कर दे बेटी। मैंने अपनी पुरानी सोच के कारण तुझे बहुत रुलाया। लेकिन आज तूने साबित कर दिया कि बेटियां अगर ठान लें, तो वो क्या नहीं कर सकतीं।"
सुमेधा ने मुस्कुराते हुए राघव की तरफ देखा। वह जानती थी कि उसके इस सफर की असली हीरो वह नहीं, बल्कि उसका पति है, जिसने दुनिया के तानों के आगे एक मजबूत दीवार बनकर अपनी पत्नी के सपनों की हिफाज़त की थी। एक पति के अटूट विश्वास ने आज समाज की पुरानी बेड़ियों को तोड़कर एक नई इबारत लिख दी थी।
क्या आपको भी लगता है कि अगर पति का साथ हो तो औरत कोई भी मुकाम हासिल कर सकती है? या क्या आपने भी कभी अपने सपनों के लिए समाज और परिवार के तानों का सामना किया है? अपने विचार नीचे कमेंट करके हमारे साथ ज़रूर साझा करें।
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