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भरोसे की दरार: एक आधुनिक दांपत्य की अनकही उलझन

 कॉफी शॉप के एक शांत कोने में बैठे हुए विकास और उसके सहकर्मी मयंक के बीच एक गहरी और गंभीर बहस चल रही थी। मयंक स्वभाव से थोड़ा रूढ़िवादी था और उसे अपनी पत्नी का अपने पुरुष सहकर्मियों के साथ हंस-बोल कर बात करना बिल्कुल पसंद नहीं था। आज वह विकास को भी उसी चश्मे से दुनिया देखने की नसीहत दे रहा था।

विकास अपनी कॉफी का कप मेज़ पर रखते हुए बोला, "मयंक, पहले मुझे अपनी बात पूरी करने दे। हमारी पत्नियों और उनके ऑफिस के पुरुष सहकर्मियों के बीच दोस्ती का ही तो संबंध है। देख भाई, पहले का वक्त अलग था, तब औरतों का घर से बाहर निकलना और पुरुषों के साथ उठना-बैठना नहीं होता था। लेकिन आज की नारी पढ़ी-लिखी है, वो ऑफिस जाती है, टीम के साथ काम करती है और बाहर की दुनिया के सारे मोर्चे संभालती है। इस वजह से उसकी जान-पहचान और बातचीत का दायरा काफी बड़ा हो गया है। तो क्या इन पुरुषों में से कोई उसका एक अच्छा मित्र नहीं बन सकता? हमें अपनी सोच बदलनी होगी।"

मयंक ने विकास की बात सुनकर एक ठंडी सांस ली और अपने चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता लाते हुए कहा, "हमें दूसरों की और इस पश्चिमी सभ्यता की अंधी नकल नहीं करनी है, विकास। हम इतने आज़ादख्याल होने के नाम पर ऐसे बीज बोने की इजाज़त क्यों दें, जिसके कारण कल को हमें ही कड़वे फल खाने पड़ें? औरत और मर्द कभी सिर्फ दोस्त नहीं हो सकते। आज की ये आज़ादी कल तुम्हारे घर का सुकून छीन लेगी, लिखकर ले लो।"

मयंक के ये शब्द विकास के कानों में किसी सीसे की तरह पिघल कर उतर गए। विकास हमेशा से खुद को एक खुले विचारों वाला और अपनी पत्नी श्रुति से बेइंतहा प्यार करने वाला पति मानता था। श्रुति एक विज्ञापन कंपनी में क्रिएटिव हेड थी। उसका काम ऐसा था जहाँ उसे अक्सर देर रात तक ऑफिस में रुकना पड़ता था और अपने टीम मेंबर्स के साथ मीटिंग्स करनी पड़ती थीं। उसकी टीम में उसका एक बहुत अच्छा दोस्त था—आकाश। आकाश और श्रुति कॉलेज के दिनों से एक-दूसरे को जानते थे और दोनों के बीच एक बेहद सहज और पारदर्शी दोस्ती थी। विकास भी आकाश को जानता था और उसे वह एक सुलझा हुआ इंसान लगता था।

लेकिन मयंक के साथ हुई उस बातचीत ने विकास के दिमाग में शक का एक ऐसा अदृश्य बीज बो दिया था, जिसे पनपने के लिए सिर्फ एक गलतफहमी की ज़रूरत थी। इंसान का मन बड़ा अजीब होता है, जब इसमें शक का जहर घुलता है, तो उसे हर सामान्य चीज़ में भी साजिश नज़र आने लगती है।

उस शाम जब विकास घर लौटा, तो श्रुति सोफे पर बैठकर अपने लैपटॉप पर कुछ काम कर रही थी और फोन पर किसी से बात करते हुए ज़ोर-ज़ोर से हंस रही थी। पहले विकास को श्रुति की यह हंसी बहुत सुकून देती थी, लेकिन आज मयंक के उन 'कड़वे फलों' वाले तानें ने विकास के मन में एक अजीब सी उलझन पैदा कर दी।

"किससे इतनी लंबी बात हो रही है?" विकास ने अपनी टाई ढीली करते हुए थोड़े रूखेपन से पूछा।

श्रुति ने फोन कान से हटाए बिना मुस्कुरा कर कहा, "आकाश है। आज की प्रेजेंटेशन को लेकर कुछ मज़ाकिया किस्से सुना रहा है। मैं अभी बस पाँच मिनट में तुम्हें खाना देती हूँ।"

विकास बिना कुछ कहे सीधे बेडरूम में चला गया। उस रात खाने की मेज़ पर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा रहा। श्रुति ने कई बार बात करने की कोशिश की, लेकिन विकास हर बात का जवाब सिर्फ 'हाँ' या 'ना' में दे रहा था। श्रुति को लगा कि शायद ऑफिस में काम का तनाव होगा, इसलिए उसने ज्यादा कुरेदना ठीक नहीं समझा।

दिन बीतते गए और विकास का व्यवहार और भी अजीब होता गया। वह अब बात-बात पर चिढ़ने लगा था। जब भी श्रुति का फोन बजता, विकास की नज़रें सबसे पहले स्क्रीन पर जातीं। अगर कॉल आकाश का होता, तो विकास के चेहरे का रंग ही बदल जाता। वह अक्सर श्रुति से ताने भरे लहज़े में पूछता, "क्या तुम्हारे ऑफिस में आकाश के अलावा कोई और इंसान नहीं है जिससे तुम काम की बात कर सको?"

श्रुति, जो एक बेहद स्वाभिमानी और सच्ची स्त्री थी, विकास के इस बदलते रवैये से अंदर ही अंदर घुटने लगी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि जिस पति ने हमेशा उसकी आज़ादी और उसके करियर का सम्मान किया था, वह अचानक इतना संकीर्ण और शक्की कैसे हो गया।

एक दिन बात पूरी तरह से बिगड़ गई। श्रुति के जन्मदिन की रात थी। विकास ने एक बहुत ही शानदार डिनर प्लान किया था। दोनों घर पर ही थे और एक अच्छा वक़्त बिता रहे थे। तभी श्रुति के फोन पर एक मैसेज की बीप बजी। विकास, जो फोन के पास ही बैठा था, उसने अनजाने में स्क्रीन की तरफ देख लिया। मैसेज आकाश का था, जिसमें लिखा था, "हैप्पी बर्थडे श्रुति! तुमने आज जो ड्रेस पहनी है, उसमें तुम सच में बहुत खूबसूरत लग रही हो। हमेशा खुश रहना!"

यह मैसेज पढ़ते ही विकास के सब्र का बाँध टूट गया। उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने फोन उठाकर श्रुति के सामने फेंक दिया। "यह क्या है श्रुति? तुम्हारे इस 'दोस्त' को तुम्हारी ड्रेस के बारे में कैसे पता? और उसे तुम्हें इस तरह के मैसेज भेजने की क्या ज़रूरत है? क्या तुम दोनों के बीच ऑफिस के बाहर भी यही सब चलता रहता है?" विकास की आवाज़ में गुस्सा और शक दोनों की गूँज थी।

श्रुति एक पल के लिए सन्न रह गई। उसने मैसेज पढ़ा और फिर एक गहरी निराशा के साथ विकास की तरफ देखा। "विकास, आज मैंने अपनी ये तस्वीरें अपनी सोशल मीडिया प्रोफाइल पर डाली थीं। आकाश ने वहीं से देखकर मुझे विश किया है। इसमें गलत क्या है? तुम मुझ पर शक कर रहे हो? मुझ पर?" श्रुति की आवाज़ कांप रही थी और उसकी आँखों में आँसू भर आए थे।

"शक नहीं कर रहा हूँ, लेकिन हर चीज़ की एक मर्यादा होती है। मैं उन बेवकूफ पतियों में से नहीं हूँ जो अपनी पत्नी को आज़ादी देने के नाम पर अपनी आँखें बंद कर लें। मुझे मयंक ने बिल्कुल सही कहा था कि ये जो पुरुष मित्र होते हैं, ये सिर्फ घर तोड़ने का काम करते हैं।" विकास ने अपनी आवाज़ और तेज़ कर दी।

मयंक का नाम सुनते ही श्रुति को सारी कहानी समझ आ गई। उसे यह देखकर बहुत गहरी चोट लगी कि उसके पति ने उस पर विश्वास करने के बजाय एक बाहरी इंसान की संकीर्ण बातों पर विश्वास किया।

श्रुति ने अपने आँसू पोंछे और अपनी आवाज़ को बेहद शांत लेकिन दृढ़ रखते हुए कहा, "विकास, मुझे आज तुमसे ये उम्मीद नहीं थी। मैंने आज तक अपनी ज़िंदगी में तुमसे कुछ नहीं छिपाया। आकाश मेरा एक बहुत अच्छा दोस्त है और रहेगा। अगर मैं पुरुष सहकर्मियों के साथ काम करती हूँ, उनके साथ हंसती-बोलती हूँ, तो इसका मतलब यह नहीं कि मेरा चरित्र खराब है या मेरे दांपत्य जीवन में कोई खोट है।"

श्रुति अपनी अलमारी की तरफ गई और उसने अपने सारे सोशल मीडिया अकाउंट्स और फोन के पासवर्ड एक कागज़ पर लिखकर विकास के सामने रख दिए। "ये लो विकास। आज से तुम मेरी हर बात, हर मैसेज, हर कॉल पर नज़र रखना। लेकिन एक बात याद रखना, जिस रिश्ते में भरोसा साबित करने के लिए पासवर्ड देने पड़ें, वहाँ प्यार और सम्मान की मौत हो जाती है। तुमने आज मुझ पर शक नहीं किया है, तुमने मेरे उस गुरूर को तोड़ा है जो मुझे तुम्हारी पत्नी होने पर था।"

यह कहकर श्रुति रोते हुए गेस्ट रूम में चली गई और अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया।

विकास अकेला उस कमरे में खड़ा रह गया। मेज़ पर पड़ा वह कागज़ उसे किसी कांटे की तरह चुभ रहा था। श्रुति के वो आख़िरी शब्द उसके कानों में हथौड़े की तरह बज रहे थे—'तुमने मेरे गुरूर को तोड़ा है।' अचानक विकास को मयंक का चेहरा याद आया। मयंक, जो अपनी पत्नी को हमेशा घर में कैद रखता था, जिसकी अपनी शादीशुदा ज़िंदगी नरक बनी हुई थी, और वह वही नरक विकास की ज़िंदगी में भी घोलना चाहता था।

विकास को अपनी भूल का गहरा अहसास हुआ। उसे समझ आ गया कि आधुनिक समय में जहाँ स्त्रियां कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, वहाँ उनके पुरुष मित्र होना एक बेहद सामान्य बात है। किसी भी रिश्ते की नीव उसका आपसी विश्वास होती है, और उसने किसी और की बातों में आकर अपनी ही उस नीव को खोखला कर दिया था। वह भूल गया था कि श्रुति ने हर कदम पर उसका साथ दिया था, कभी उससे झूठ नहीं बोला था।

अगले दिन सुबह विकास बहुत जल्दी उठ गया। उसने श्रुति के लिए खुद अपने हाथों से चाय बनाई और नाश्ता तैयार किया। जब श्रुति की आँख खुली, तो उसने देखा कि विकास उसके सिरहाने बैठा है। उसकी आँखों में पछतावे के आँसू थे।

"मुझे माफ कर दो श्रुति," विकास ने श्रुति का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा। "मैं सच में अंधा हो गया था। मैंने समाज की उस संकीर्ण सोच और एक बाहरी इंसान की बातों को अपनी ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत रिश्ते के बीच आने दिया। तुमने सही कहा था, जहाँ शक आ जाता है, वहाँ प्यार कमज़ोर पड़ जाता है। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि आज के बाद ऐसा कभी नहीं होगा। तुम्हारी आज़ादी और तुम्हारी दोस्ती पर मुझे पूरा भरोसा है।"

श्रुति ने विकास की आँखों में देखा। वहाँ अब कोई शक नहीं था, सिर्फ वो पुराना प्यार और सम्मान था। उसने विकास को माफ कर दिया, क्योंकि वह जानती थी कि इंसान से गलती हो जाती है, लेकिन अगर वह अपनी गलती सुधार ले, तो रिश्ता पहले से भी ज्यादा मज़बूत हो जाता है। उस दिन के बाद से विकास और श्रुति के बीच भरोसे की एक ऐसी मज़बूत दीवार खड़ी हो गई, जिसे कोई मयंक कभी नहीं गिरा सकता था।


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