शहर के सबसे बड़े मनोरोग पुनर्वास केंद्र के एक शांत और सुनसान कोने में 32 वर्षीय वेदांत घंटों से एक ही दीवार को बिना पलक झपकाए घूर रहा था। उसकी आँखों में ना तो कोई दर्द था, ना ही कोई खुशी, बस एक अंतहीन शून्यता थी जैसे किसी ने उसकी आत्मा को निचोड़ कर बाहर निकाल लिया हो। वार्ड का मुआयना करने आईं सीनियर साइकिएट्रिस्ट डॉ. शिखा ने जब वेदांत को इस तरह मृतप्राय अवस्था में देखा, तो उनके साथ चल रहे जूनियर डॉक्टर आयुष से रहा नहीं गया।
डॉक्टर आयुष ने पूछा, "मैम, यह पेशेंट पिछले छह महीनों से ऐसा ही है। इसकी फाइल में लिखा है कि यह एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। ऐसा क्या हुआ कि इतने होनहार इंसान की यह हालत हो गई?"
डॉक्टर शिखा ने एक गहरी और सर्द आह भरी। उनका मन अतीत के पन्नों में उलझ गया था। उन्होंने वेदांत की तरफ देखते हुए बहुत ही उदास स्वर में कहा, "डॉक्टर आयुष, यह दीवार को नहीं घूर रहा है, यह अपने उस छिने हुए सम्मान, अपने माता-पिता की चिता की राख और अपनी बर्बाद हुई ज़िंदगी के पन्नों को घूर रहा है। वेदांत सिर्फ एक मरीज़ नहीं है, वह हमारे समाज की उस सड़ी हुई मानसिकता और कानून के दुरुपयोग का जीता-जागता सुबूत है, जहाँ एक झूठा आरोप एक पूरे हंसते-खेलते परिवार को मौत के घाट उतार देता है।"
वेदांत का परिवार शहर के एक बहुत ही सम्मानित और मध्यवर्गीय मोहल्ले में रहता था। उसके पिता, श्री रघुवीर सहाय, शहर के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित सरकारी स्कूल के रिटायर्ड प्रिंसिपल थे। पूरा मोहल्ला उनके उसूलों और उनकी ईमानदारी की कसमें खाता था। वेदांत की माँ, सुशीला देवी, एक बेहद ही सरल और ममतामयी गृहिणी थीं। वेदांत उनका इकलौता बेटा था। पढ़ाई-लिखाई में अव्वल वेदांत ने जब एक बड़ी आईटी कंपनी में नौकरी पाई, तो रघुवीर जी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था। उन्होंने अपनी पाई-पाई जोड़कर वेदांत को पढ़ाया था और अब उनके बुढ़ापे का सहारा उनके सामने एक सफल इंसान के रूप में खड़ा था।
समय बीतने के साथ वेदांत के लिए रिश्ते आने लगे। रघुवीर जी और सुशीला देवी ने वेदांत के लिए मालविका नाम की एक लड़की को चुना। मालविका एक अमीर घर की पढ़ी-लिखी लड़की थी। वेदांत के माता-पिता को लगा कि एक शिक्षित लड़की घर को और भी बेहतर तरीके से संवारेगी। दोनों की शादी बहुत ही धूमधाम से हुई। वेदांत ने अपनी ज़िंदगी भर की बचत अपनी पत्नी की खुशियों पर लुटा दी। लेकिन किसी ने सच ही कहा है कि इंसान का असली चेहरा तब सामने आता है जब वह अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलता है।
शादी के कुछ महीनों बाद ही मालविका का असली रूप सामने आने लगा। वह अत्यंत महत्वाकांक्षी, स्वार्थी और भौतिकवादी स्वभाव की थी। उसे वेदांत के छोटे घर, उसके बूढ़े माता-पिता के सीधेपन और मध्यवर्गीय जीवनशैली से घुटन होने लगी। वह हर दिन किसी न किसी बात पर सुशीला देवी को ताने मारती। कभी खाने में कमी निकालती, तो कभी उनके कपड़ों के पहनावे पर व्यंग्य करती। वेदांत जब ऑफिस से थका-हारा लौटता, तो उसे घर में शांति की जगह रोज़ एक नया क्लेश मिलता। मालविका की बस एक ही ज़िद थी कि वेदांत अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर उसके साथ एक पॉश इलाके में अलग फ्लैट ले ले।
वेदांत अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता था, लेकिन वह उन माता-पिता को कैसे छोड़ सकता था जिन्होंने अपनी पूरी जवानी उसकी सफलता की नींव रखने में गला दी थी? उसने मालविका को बहुत समझाने की कोशिश की कि वे कुछ साल बाद एक बड़ा घर ले लेंगे जहाँ सब साथ रह सकें, लेकिन मालविका को समझौता करना मंजूर नहीं था। बात-बात पर वह घर का सामान फेंकना, गालियां देना और चीखना शुरू कर देती। वेदांत जो ऑफिस में अपनी टीम को लीड करता था, वह अपने ही घर में अपनी पत्नी की प्रताड़नाओं के आगे घुटने टेकने लगा था। वह रातों को सो नहीं पाता था। सुशीला देवी अपने बेटे की यह हालत देखकर रोज़ छुप-छुप कर रोती थीं, और रघुवीर जी की तो जैसे रीढ़ की हड्डी ही टूट गई थी। वे मोहल्ले वालों से नज़रें चुराने लगे थे।
एक रात बात बहुत बिगड़ गई। मालविका ने वेदांत के माता-पिता के लिए कुछ ऐसे अपशब्द कहे जो वेदांत बर्दाश्त नहीं कर सका। उसने मालविका को शांत होने के लिए कसकर पकड़ लिया। मालविका ने इसे एक अवसर बना लिया। उसने खुद ही अपना सिर दीवार पर दे मारा, अपने कपड़े फाड़ लिए और घर का दरवाज़ा खोलकर मोहल्ले में चीखने लगी कि उसका पति और सास-ससुर उसे दहेज के लिए जान से मारना चाहते हैं। पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो गया। जिन रघुवीर जी के सामने लोग सम्मान से सिर झुकाते थे, आज वही लोग उनके घर के बाहर तमाशबीन बने खड़े थे और तरह-तरह की बातें बना रहे थे।
मालविका उसी रात अपने मायके चली गई और अगले ही दिन पुलिस वेदांत के घर आ पहुँची। मालविका और उसके रसूखदार परिवार ने वेदांत, उसके पिता रघुवीर जी और उसकी माँ सुशीला देवी पर दहेज प्रताड़ना (धारा 498ए), घरेलू हिंसा और हत्या के प्रयास जैसे कई संगीन और झूठे मामले दर्ज़ करा दिए। पुलिस ने बिना कोई जांच किए, बिना पड़ोसियों के बयान लिए, वेदांत और उसके सत्तर साल के बूढ़े पिता को हथकड़ियां पहना दीं।
डॉक्टर शिखा ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, "आयुष, तुम्हें पता है उस दिन क्या हुआ था? जब रघुवीर जी को हथकड़ी लगी, तो वे रोए नहीं थे। वे बस पत्थर की तरह सुन्न पड़ गए थे। जिस इंसान ने 40 साल तक हज़ारों बच्चों को चरित्र और नैतिकता का पाठ पढ़ाया, उसे उसी के मोहल्ले में पुलिस घसीटते हुए ले जा रही थी। वेदांत को जेल में डाला गया। पुलिस रिमांड के दौरान उसके साथ जो शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न हुआ, उसने वेदांत के आत्मविश्वास को पूरी तरह कुचल दिया। उसकी कंपनी ने उसे तुरंत नौकरी से निकाल दिया। एक सफल इंजीनियर रातों-रात एक अपराधी बन गया।"
वेदांत को जमानत मिलने में दो महीने लग गए। इस दौरान उसका पूरा परिवार आर्थिक और सामाजिक रूप से बर्बाद हो चुका था। वकील की फीस भरते-भरते रघुवीर जी की सारी जमा-पूंजी खत्म हो गई थी। मोहल्ले वालों ने उनका हुक्का-पानी बंद कर दिया था। सुशीला देवी जब कभी बाहर निकलतीं, तो औरतें मुँह फेर लेतीं या ताने मारतीं। वेदांत जब ज़मानत पर बाहर आया, तो वह अपने घर की दहलीज पर कदम रखते ही फफक कर रो पड़ा। लेकिन उसके रोने से ज्यादा दर्दनाक वो खामोशी थी जो उसके घर में पसरी थी।
अगले कुछ महीने कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने में बीत गए। मालविका का वकील हर पेशी पर रघुवीर जी और वेदांत को सरेआम ज़लील करता। मालविका ने भारी एलिमनी (गुज़ारा भत्ता) की मांग रख दी थी जिसे चुकाना वेदांत के लिए अब असंभव था क्योंकि उसके पास नौकरी नहीं थी। लगातार हो रहे मानसिक उत्पीड़न और समाज के तानों ने उस परिवार का जीना मुश्किल कर दिया था। जिस दिन कोर्ट ने मालविका के पक्ष में एकतरफा फैसला सुनाते हुए वेदांत को लाखों रुपये का मुआवज़ा देने और संपत्ति नाम करने का आदेश दिया, उस दिन वेदांत की मानसिक हालत पूरी तरह खराब हो चुकी थी।
फैसला आने के महज़ एक हफ्ते बाद की वह काली सुबह कोई नहीं भूल सकता। जब दूध वाला दरवाज़ा खटखटा कर थक गया, तो पुलिस बुलाई गई। दरवाज़ा टूटने पर जो नज़ारा सामने था, उसने पत्थर दिल इंसान को भी रुला दिया। रघुवीर जी और सुशीला देवी ने पंखे से लटककर आत्महत्या कर ली थी। उनके पास एक सुसाइड नोट मिला, जिसमें रघुवीर जी ने कांपते हाथों से लिखा था— 'हम किसी से नहीं हारे, हम इस देश के उस अंधे कानून से हार गए हैं जिसने एक झूठी औरत के आंसुओं को तो देखा, लेकिन एक बेगुनाह परिवार का खून उसे दिखाई नहीं दिया। हम अपनी इज़्ज़त के बिना नहीं जी सकते।'
माता-पिता की लाशों को फंदे पर झूलता देख वेदांत उसी पल अपना मानसिक संतुलन पूरी तरह खो बैठा। उसने चिल्लाना, रोना सब बंद कर दिया। उसके बाद से ही उसे इस मनोरोग केंद्र में लाया गया है। मालविका पैसे और घर लेकर अपनी नई ज़िंदगी शुरू कर चुकी है, लेकिन एक आदर्शवादी, होनहार लड़का और उसका खुशहाल परिवार हमेशा के लिए खाक हो गया।
कुछ देर की भारी खामोशी के बाद डॉक्टर शिखा फिर बोलीं, "आयुष, मैं एक महिला हूँ और मैं यह अच्छी तरह मानती हूँ कि घरेलू हिंसा एक भयानक सच्चाई है जिसका सामना अनगिनत महिलाओं को आज भी करना पड़ता है। इसीलिए स्त्रियों की रक्षा हेतु इन कड़े कानूनों का गठन किया गया था, ताकि कोई भी पुरुष अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल न कर सके।"
"परंतु," डॉक्टर शिखा की आवाज़ अब भारी हो चुकी थी, "घरेलू हिंसा से पीड़ित उन पुरुषों का क्या? उन पर उनकी स्त्रियों द्वारा की गई मानसिक और शारीरिक हिंसा का क्या? जब कोई स्त्री कानून का इस्तेमाल एक हथियार की तरह करती है, तो उसकी सज़ा सिर्फ एक पुरुष नहीं भुगतता, बल्कि उसके निर्दोष माता-पिता, उसकी बहनें और उसका पूरा वजूद भुगतता है। हमारे समाज में अगर औरत रोती है, तो सब मान लेते हैं कि वह पीड़ित है। लेकिन जब एक आदमी रोता है, जब वह अपनी बेगुनाही की भीख मांगता है, तो उसे 'मर्द' होने का ताना देकर उसकी आवाज़ दबा दी जाती है। महिलाओं के लिए तो महिला आयोग है, कई संस्थाएं हैं, लेकिन एक बेकसूर आदमी के दर्द को सुनने वाला इस देश में कोई आयोग क्यों नहीं है? वेदांत का यह खामोश चेहरा हर दिन हमारे न्याय व्यवस्था से यही सवाल करता है कि क्या पुरुष होना ही इस देश में सबसे बड़ा अपराध है?"
डॉक्टर आयुष की आँखें भी अब तक नम हो चुकी थीं। वेदांत अभी भी उसी दीवार को घूर रहा था, शायद वो उन दीवारों में अपने माता-पिता के चेहरे ढूंढ रहा था या फिर उस न्याय को, जो उसे जीते जी कभी मिल नहीं सका।
क्या आपको भी लगता है कि हमारे समाज में और कानूनी व्यवस्था में पुरुषों के खिलाफ हो रहे झूठे मुकदमों और मानसिक प्रताड़ना को गंभीरता से लेने की सख्त ज़रूरत है? अपने विचार ज़रूर साझा करें।
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