मुंबई की लोकल ट्रेन की तरह ही सुहानी की जिंदगी भी एक अनवरत और तेज रफ्तार से भाग रही थी। मरीन ड्राइव के पास स्थित अपने 15वीं मंजिल के फ्लैट की बालकनी में खड़ी सुहानी आज समंदर की लहरों को बहुत गौर से देख रही थी। लहरें आती थीं, किनारे से टकराकर टूट जाती थीं और फिर वापस लौट जाती थीं। सुहानी को अपना जीवन भी कुछ ऐसा ही लगता था। उसके हाथ में कॉफी का मग था, जिसकी कॉफी अब तक ठंडी हो चुकी थी। तभी अंदर रखे फोन की रिंगटोन ने समंदर की आवाज को चीरते हुए उस सन्नाटे को तोड़ा। स्क्रीन पर 'माँ' का नाम चमक रहा था। सुहानी ने एक गहरी सांस ली, अपनी आँखें मूंदीं और फोन उठा लिया।
"सुहानी बेटा, आज शर्मा जी ने एक बहुत अच्छा रिश्ता भेजा है। लड़का मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट है। बस एक बार तलाक हुआ है उसका, लेकिन इंसान बहुत सुलझा हुआ है। और हाँ, वो हमारी जाति का नहीं है, पर अब हमें इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। तू एक बार बस तस्वीर देख ले।" माँ की आवाज़ में एक अजीब सी जल्दबाज़ी और मिन्नत थी।
सुहानी के होठों पर एक कड़वी मुस्कान तैर गई। यह कोई नई बात नहीं थी। पिछले पांच सालों से जब से वह अपना घर छोड़कर इस अनजान शहर में आई थी, तब से हर दूसरे दिन माँ का ऐसा ही फोन आता था। दरअसल, सुहानी के अपने घर से इतनी दूर आकर बसने की एक सबसे बड़ी वजह सिर्फ उसका करियर नहीं था। वह उस घुटन से भागना चाहती थी जो उसे अपने ही घर में महसूस होती थी। वह विवाह नहीं करना चाहती थी और यह बात उसका परिवार किसी भी कीमत पर समझने को तैयार नहीं था।
आज सुहानी 36 वसंत देख चुकी थी। उसकी उम्र का हवाला देकर अब उसके माता-पिता किसी भी तरह, किसी से भी उसका विवाह कर देना चाहते थे। उन्हें अब न लड़के की उम्र से मतलब था, न उसकी जाति से, और न ही इस बात से कि वह तलाकशुदा है या विधुर। उन्हें बस इस बात की जल्दी थी कि उनकी बेटी के नाम के आगे किसी तरह 'श्रीमती' लग जाए, ताकि समाज के तानों से उन्हें मुक्ति मिल सके।
लेकिन सुहानी के लिए यह सब एक बहुत भद्दा मजाक था। वह हमेशा से विवाह के खिलाफ नहीं थी। आज से दस साल पहले, जब वह 26 साल की थी, तो उसके जीवन में भी वसंत आया था। उसका नाम कबीर था। कबीर और सुहानी एक ही कॉलेज में पढ़े थे और एक-दूसरे को बेइंतहा प्यार करते थे। कबीर एक बेहद समझदार, सुलझा हुआ और करियर में सफल लड़का था। उसमें वो सारी खूबियां थीं जो एक लड़की अपने जीवनसाथी में देखती है। लेकिन कबीर का सरनेम सुहानी के परिवार की 'उच्च जाति' के मापदंडों पर खरा नहीं उतरता था।
जब सुहानी ने अपने घर में कबीर से विवाह की बात रखी थी, तो मानो भूचाल आ गया था। उस दिन घर के आंगन में जैसे कोई अदालत बैठ गई थी। पिता जी ने खाना-पीना छोड़ दिया था, माँ ने छाती पीट-पीट कर रोना शुरू कर दिया था और रिश्तेदारों ने ताने मारे थे—"हमारी तो नाक कट जाएगी समाज में! इस लड़की ने तो हमारे संस्कारी खानदान की इज्जत को मिट्टी में मिला दिया।" उन लोगों ने सुहानी पर इतना मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक दबाव डाला कि सुहानी टूट गई। पिता की झूठी शान और माँ के आंसुओं के आगे उसने अपने प्यार की बलि चढ़ा दी। उसने कबीर से हमेशा के लिए मुंह मोड़ लिया। कबीर बहुत रोया, उसने सुहानी के माता-पिता के सामने हाथ जोड़े, लेकिन जात-बिरादरी की वो दीवार इतनी ऊंची और मजबूत थी कि उसके प्यार की आवाज किसी को सुनाई नहीं दी।
सुहानी ने अपने दिल के टुकड़े समेटे और खुद को काम में झोंक दिया। उसने मान लिया था कि शायद समाज के यही नियम हैं और एक अच्छी बेटी होने के नाते उसे यही करना चाहिए।
लेकिन सुहानी का यह भ्रम तब टूटकर चकनाचूर हो गया जब दो साल पहले उसके छोटे भाई, रोहन ने अपने प्यार का ऐलान किया। रोहन ने एक ऐसी लड़की से विवाह करने की जिद पकड़ ली जो न सिर्फ उनकी जाति की नहीं थी, बल्कि उसका धर्म भी अलग था। सुहानी को लगा कि अब घर में फिर से वही महाभारत होगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। रोहन ने बस एक बार धमकी दी कि अगर उसकी शादी वहां नहीं हुई तो वह घर छोड़कर चला जाएगा। और रातों-रात समाज के सारे नियम, सारी मर्यादाएं, और जात-बिरादरी की वो ऊंची दीवारें ताश के पत्तों की तरह ढह गईं।
सुहानी हैरान थी। माता-पिता ने खुशी-खुशी उस रिश्ते को अपना लिया। रोहन की शादी बहुत ही धूमधाम से हुई, शहर के सबसे बड़े होटल में रिसेप्शन दिया गया और समाज के उन्हीं ठेकेदारों ने दावतें उड़ाईं जो सुहानी के वक्त नाक-भौं सिकोड़ रहे थे। उस दिन सुहानी एक कोने में खड़ी होकर इस दोहरे मापदंड को देख रही थी। उसे कबीर की बहुत याद आई। उसे समझ आ गया था कि समाज के कड़े नियम सिर्फ बेटियों को डराने और उनके पंख काटने के लिए होते हैं। बेटों की एक जिद के आगे माता-पिता के सारे खोखले आदर्श पानी भरते नजर आते हैं।
समय के साथ लोगों की प्राथमिकता कैसे बदल जाती है, यह सुहानी से बेहतर कौन जान सकता था। कल तक जो लोग उसके प्यार को 'पाप' बता रहे थे, आज वही लोग उसके भाई की पसंद पर तालियां बजा रहे थे। और वही लोग आज सुहानी को किसी से भी, कैसी भी शादी कर लेने की 'आजादी' दे रहे थे।
सुहानी फोन पर माँ की बातें सुन रही थी। माँ लगातार कह रही थीं, "बेटा, मान जा ना। एक बार मिल ले। अब हम तुझ पर कोई पाबंदी नहीं लगाएंगे। तू जिसे चाहेगी, हम तेरी शादी उसी से कर देंगे। बस तू हाँ कर दे।"
सुहानी के गले में एक भारीपन आ गया। उसने बहुत ही शांत, लेकिन ठहरी हुई आवाज़ में कहा, "माँ, आप मुझे अब किस बात की आज़ादी दे रही हैं? उस वक्त जब मेरे अंदर एक घर बसाने की चाहत थी, जब मैं कबीर के साथ अपने सुनहरे भविष्य के सपने देखती थी, तब आपने और पापा ने मुझे जात-बिरादरी की बेड़ियों में जकड़ दिया था। तब आपको मेरी खुशियों से ज्यादा समाज की बातों की फिक्र थी। और आज... आज जब मेरी वो चाहत ही मर चुकी है, जब मेरे अंदर किसी के साथ घर बसाने की कोई इच्छा ही नहीं बची, तो आप मुझे आसमान दे रही हैं?"
"बेटा, इंसान से गलती होती है। हम उस वक्त नासमझ थे। हमें समाज का डर था। तू पुरानी बातों को भूलकर एक नई शुरुआत क्यों नहीं करती?" माँ की आवाज़ रुंध गई थी।
सुहानी ने बालकनी की ग्रिल को पकड़ते हुए कहा, "माँ, कुछ चीजें समय बीत जाने के बाद अपनी अहमियत खो देती हैं। आपने मुझे वो पौधा समझ लिया है जिसे जब चाहे उखाड़ कर फेंक दिया, और जब मन किया तो वापस गमले में लगा दिया। लेकिन माँ, सूखे दरख्तों पर घोंसले नहीं बनते। अब मैं बहुत आगे निकल आई हूँ। मेरे अंदर अब किसी रिश्ते के लिए कोई जगह नहीं है।"
माँ सुबकते हुए बोलीं, "पर ऐसे कब तक अकेले रहेगी तू? जिंदगी बहुत लंबी है बेटा।"
सुहानी की आँखों से एक आंसू छलक कर उसके गालों पर आ गिरा, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था। उसने कहा, "माँ, आप मुझे कैसे समझाएंगी? आप नहीं जानती कि 'सूखे फूलों से खुशबू नहीं आती, वो सिर्फ किताबों में बंद एक बेजान याद बन कर रह जाते हैं।' आपने दस साल पहले मुझे नींद से इस कदर झकझोर कर जगाया था कि अब मुझे दोबारा सपने देखने से डर लगता है। 'नींद खुलने पर सपने भी भाप बन उड़ जाते हैं माँ।' मेरे सपने भी उसी दिन भाप बन गए थे जब आपने कबीर को हमारे दरवाजे से बेइज्जत करके निकाला था। अब मुझे अपनी इस शांति से प्यार हो गया है। मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए। मैं जैसी हूँ, खुश हूँ।"
सुहानी ने फोन काट दिया। उसने ठंडी हो चुकी कॉफी का एक घूंट भरा और सामने फैले विशाल समंदर को देखने लगी। आज उसके कंधों से जैसे सालों पुराना कोई बोझ उतर गया था। उसने समाज और परिवार की उन झूठी उम्मीदों को हमेशा के लिए समंदर की लहरों में बहा दिया था जो उसके अस्तित्व को दीमक की तरह खा रही थीं। अब वो सिर्फ सुहानी थी—आजाद, आत्मनिर्भर और अपनी शर्तों पर जीने वाली।
दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या समाज और परिवार में बेटियों और बेटों के लिए आज भी अलग-अलग नियम होते हैं? क्या सुहानी का अपनी जिंदगी अकेले जीने का यह फैसला सही था, या उसे परिवार की खातिर एक और समझौता कर लेना चाहिए था? अपने विचार और अपनी बेबाक राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। आपके विचार किसी और सुहानी को हिम्मत दे सकते हैं।
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