मंदिर की घंटी की आवाज़ जब सुबह-सुबह हवा में घुलती, तो उसके साथ एक और चीज़ भी जाग उठती—पुरानी हवेली के पीछे वाले आँगन में रखा मिट्टी का घड़ा और उस घड़े के पास बैठी एक लड़की की आँखों में चमक। उसका नाम था इरा । गाँव वाले उसे “अजीब” कहते थे, क्योंकि वह बाकी लड़कियों की तरह चूड़ियाँ चुनने या मेहंदी के डिज़ाइन पर बहस करने के बजाय मिट्टी को उँगलियों से पढ़ती थी—जैसे मिट्टी कोई किताब हो और वह उसके अक्षर पहचानती हो। इरा का घर हवेली नहीं था, हवेली के पास बनी छोटी-सी कोठरी थी। पिता हरिदत्त पुराने ज़माने के कुम्हार थे; उनके हाथ में मिट्टी आती तो फूल बन जाती, और उनके चेहरे पर गरीबी आती तो भी मुस्कान बनकर टिक जाती। माँ ललिता हर काम में इरा की पीठ थपथपाती रहतीं, मगर उनकी चिंता एक ही रहती—“बेटी, इतना मिट्टी-मिट्टी मत करती रह… हाथ खुरदरे हो जाएंगे, लोग क्या कहेंगे?” इरा हँस देती, “लोग कहेंगे तो क्या, माँ? मिट्टी तो मेरे हाथ में भी बोलती है।” उस दिन भी दोपहर की धूप चाक पर गिर रही थी। इरा ने पानी की कटोरी पास रखी, दोनों हथेलियाँ भिगोईं और चाक घुमाया। मिट्टी ऊपर उठी, उसकी उँगलियों के साथ घूमी और ध...