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मदद

  मंदिर की घंटी की आवाज़ जब सुबह-सुबह हवा में घुलती, तो उसके साथ एक और चीज़ भी जाग उठती—पुरानी हवेली के पीछे वाले आँगन में रखा मिट्टी का घड़ा और उस घड़े के पास बैठी एक लड़की की आँखों में चमक। उसका नाम था इरा । गाँव वाले उसे “अजीब” कहते थे, क्योंकि वह बाकी लड़कियों की तरह चूड़ियाँ चुनने या मेहंदी के डिज़ाइन पर बहस करने के बजाय मिट्टी को उँगलियों से पढ़ती थी—जैसे मिट्टी कोई किताब हो और वह उसके अक्षर पहचानती हो। इरा का घर हवेली नहीं था, हवेली के पास बनी छोटी-सी कोठरी थी। पिता हरिदत्त पुराने ज़माने के कुम्हार थे; उनके हाथ में मिट्टी आती तो फूल बन जाती, और उनके चेहरे पर गरीबी आती तो भी मुस्कान बनकर टिक जाती। माँ ललिता हर काम में इरा की पीठ थपथपाती रहतीं, मगर उनकी चिंता एक ही रहती—“बेटी, इतना मिट्टी-मिट्टी मत करती रह… हाथ खुरदरे हो जाएंगे, लोग क्या कहेंगे?” इरा हँस देती, “लोग कहेंगे तो क्या, माँ? मिट्टी तो मेरे हाथ में भी बोलती है।” उस दिन भी दोपहर की धूप चाक पर गिर रही थी। इरा ने पानी की कटोरी पास रखी, दोनों हथेलियाँ भिगोईं और चाक घुमाया। मिट्टी ऊपर उठी, उसकी उँगलियों के साथ घूमी और ध...

वक्त

  बरसों पहले जिस गली के मोड़ पर छोटा सा ठेला लगा करता था, आज वहीं चमचमाता शोरूम खड़ा था। बड़े-बड़े अक्षरों में नाम लिखा था—“नीलिमा होम फूड्स।” शीशे के भीतर सजे मसाले, अचार, मुरब्बे, पापड़, और रेडी-टू-कुक मिक्स ऐसे रखे थे जैसे किसी प्रदर्शनी में हों। भीतर ए.सी. की ठंडी हवा थी, बाहर लोगों की भीड़। यह सब देखकर नीलिमा के चेहरे पर गर्व नहीं, एक सादगी भरी थकान उतर आती थी। वह आज भी वही सूती साड़ी पहनती थी, बालों में वही सादा सा जूड़ा और माथे पर छोटी सी बिंदी। फर्क बस इतना था कि अब उसके हाथों में बहीखाता नहीं, कंपनी का टैबलेट होता था… और उसकी जेब में चिल्लर नहीं, कार्ड। पर उसकी आँखें—उनमें आज भी वही पुरानी चुप्पी थी, जो कभी तानों से पैदा हुई थी और आज भी जरूरत पड़ने पर लौट आती थी। नीलिमा के पति प्रकाश तब दुनिया में नहीं थे। उनके जाने के बाद नीलिमा ने बच्चों के साथ मिलकर काम को सँभाला था। प्रकाश की तस्वीर आज भी ड्रॉइंग रूम में उसी जगह टंगी थी, जैसे घर का सबसे बड़ा बुजुर्ग वहीं बैठा हो—सबको देख रहा हो, सुन रहा हो। “तुम्हारे पापा होते तो कितना खुश होते,” नीलिमा अक्सर तस्वीर से कहती, और फिर क...

हालात

  सुबह की पहली ट्रेन की सीटी के साथ ही स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर हलचल बढ़ जाती थी। चायवालों की आवाज़, कुलियों की पुकार और अख़बार बेचने वालों की हड़बड़ी—सबके बीच एक लड़की रोज़ चुपचाप खड़ी रहती थी। उसका नाम था सृष्टि । न कोई जल्दी, न कोई शिकायत। बस आँखों में एक ठहराव, जैसे वह हर रोज़ इस भीड़ में खुद को ढूँढने आती हो। सृष्टि की उम्र ज़्यादा नहीं थी, लेकिन ज़िंदगी ने उसे उम्र से पहले समझदार बना दिया था। उसके पिता रेलवे में क्लर्क थे। ईमानदार, सीधे-सादे, मगर ज़रा-सी भी ऊँची आवाज़ सुनते तो चुप हो जाते। माँ गृहिणी थीं—संवेदनशील, पर कमजोर। सृष्टि इकलौती संतान थी, इसलिए घर की हर उम्मीद, हर डर, हर चिंता उसी के इर्द-गिर्द घूमती थी। पिता की अचानक हार्ट अटैक से मृत्यु हुई तो घर की दुनिया ही पलट गई। जो घर पहले सुरक्षित लगता था, वही घर अब माँ-बेटी के लिए बोझ बन गया। रिश्तेदारों की आवाजाही बढ़ी, और साथ ही बढ़ने लगीं फुसफुसाहटें— “अब अकेली औरत कैसे संभालेगी?” “लड़की बड़ी हो रही है, ज़्यादा पढ़ा-लिखा दिया तो सिर पर चढ़ जाएगी।” “किसी तरह शादी कर दो, यही ठीक रहेगा।” माँ हर बात पर चुप रहतीं। सृष्टि उनकी ...