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Showing posts from September, 2025

बारिश का मौसम

  मुझे  बारिश  का मौसम  बहुत सुहावना  लगता है  प्रायः चाय पीते हुए बारिश को देखने  का लुप्त उठाया करती हूँ। ।  मिटटी की सोंधी खुशबु और बारिश की बूंदों की आवाज बहुत  मधुर लगती  हैं   जब तेज बहाव  के साथ  पानी बालकॉनी में आता तो उस  वर्षा के फुहार के छींटें , चेहरे पर पड़ते ही एक खुशनुमा  सिरहन सी दौड़ पड़ती है।   लगभग तीन दिन से बरसात हो रही थी कभी मूसलाधार  तो कभी  बूंदा -बूंदी । अभी  नाली और सड़कें सब लबालब बरसात के पानी से भरने लगी  जो करीब 2 फुट  था। गाड़ी ,दोपहिया वाहनों के टायर पानी में डूबे हुए थे। हवाएं ऐसी चल रही थी कि छाते को लोग सभांल नहीं पा रहे थे। मैंने बालकॉनी में चेयर पर बैठते हुए अपनी घरेलू परिचारिकाओं   को चाय बनाकर वहीँ पर देने को कहा। जब सीमा ने  चाय का कप पकड़ाया तो  मैं  थोड़ी उत्साहित  होकर बोली --जाओ, तुमलोग भी यहीं चाय लेकर आ जाओ।  जब हम इकठ्ठे बैठकर चाय पी रहे थे तो मैंने  कहा -'सच में कितना अच्छा लगता है न !ऐसे चाय पीते हुए ब...

कुछ तो लोग कहेंगे !

  रोजगार के लिए मारे -२ फिरने के बाद जब कोई काम नहीं मिला तो सुजीत को एक राह सूझी ,उसने अपनी दोपहिया स्कूटी को चलती -फिरती दूकान में तब्दील कर दिया। वह  मोटर्स पार्ट्स के शॉप  में काम करता था। जब महामारी के चलते   उसके पिता  चल बसे,फिर उसकी  नौकरी छूट गई   तो वह कई दिन तक  अवसाद में  डूबा रहा  अब घर में दादा दादी ,माँ और एक छोटी बहन  की जिम्मेदारी उसके कंधे पर आ गई थी।   एक दिन  उसके दादाजी ने उसका मनोबल और हौसला बढ़ाते हुए समझाया -बेटा ,ईमानदारी और नेकनीयत से किया  गया कोई भी  काम छोटा या बड़ा नहीं होता। बस मन में संशय या आत्मग्लानि के लिए कोई  मलाल  ना रखो  ,तो सभी कार्य अनुकरणीय हैं। लोगों का क्या हैं ? -' कुछ तो लोग कहेंगे  !लोगों का काम है कहना। ,, छोड़ो बेकार की बातों में बीत न जाएं रैना। .. ये गाना मुस्कुराकर कर गुनगुनाते हुए दादाजी ने अपने पोते की पीठ थपथपाई और कहा कि --बेटा ,विकट से विकट परिस्थिति में आने वाली समस्याओं और संघर्षों का  डटकर मुकाबला करते हुए ,अपनी सूझबूझ और बुद्धि से ...

हमे इंसान हीं रहने दें!

  अस्पताल से  घर आते -आते रात के डेढ़ बज चुके थे। पहले घर का लॉक  खोलकर निकिता  बाथरूम चली गई ,उसके नहाने के बाद ,वन्दिता  नहाकर आई   ,तब तक  निकिता  दो प्यालों में  गर्म दूध डालकर डाइनिंग टेबल पर रख रही थी -उसे देखकर बोली -'-वंदु खाने को तो कुछ  भी नहीं है। फ्रिज  में दूध  पड़ा था सो गर्म कर लिया ,जरा  कॉर्नफ्लेक्स का डिब्बा दे दें आज हम दूध -कॉर्नफ्लेक्स का ही डिनर करते हैं 'हाँ दीदी रात भी तो कितनी हो गई हैं !कुछ बनाने का  मन नहीं कर रहा है हम दोनों ही तो नींद और थकान से पागल हो रखी हैं।' 'अच्छा  चलो जल्दी से खालो फिर सोना भी हैं  और फिर कल सुबह 10 बजे अस्पताल जाना भी हैं   'कहकर दोनों जोर -जोर से खिलखिलाकर हंस पड़ी। दोनों ने  खाकर बर्तन सिंक में रखा  ,बस अब वे  सोने ही जा रही थी कि डोरबेल की आवाज से दोनों सहम उठी ! इस फ्लैट में पिछले 3 साल से निकिता अपनी छोटी बहन वंदिता के साथ रह रही थी। उनकी लेंड लार्ड   सुषमा आंटी  बहुत ही अच्छी और मिलनसार महिला थी उनके घर में उनके पति रघुवीर...

पीला गुलाब

  बालकनी में रखे गमलों में पानी स्प्रे करते समय देखा कि एक गमले में गुलाब का एक पीला फूल एक छोटी सी कली के साथ मुस्कुरा रहा था। मैं सहसा ठिठक गया और हृदय से एक स्वर उभरा .."सुधा" और साथ ही फिराक गोरखपुरी का यह शे'र भी: 'एक मुद्दत से तेरी याद भी आयी न मुझे और हम भूल गए हों तुझे, ऐसा भी नहीं' ...........#.......... सुधा.. मेरी जीवनसंगिनी। बेटा दस वर्षों का हो गया और तुम्हें एक बेटी भी चाहिए थी। हमने प्रयास किया था किंतु पिछले वर्ष जाड़ों में मिसकैरिज हुआ और हम फिर से खाली हाथ रह गए। इस बार हमने खूब सावधान रखी। बराबर चिकित्सकों के सानिध्य में रहे और फिर उनके द्वारा हमारी खुशियों के लिए मई माह के प्रथम सप्ताह को निश्चित कर दिया गया। हम प्रसन्न थे, तुम तो बहुत अधिक प्रसन्न थीं। फरवरी में तुमने एक दिन कहा था कि घर में एक पीला गुलाब लगा दो। जब मैंने इसका कारण पूछा तो तुमने कहा था कि पीले रंग में वात्सल्य छुपा होता है। पीला रंग नवजीवन का प्रतीक है। पीला रंग बसन्त ऋतु का रंग है। मैं अपनी बेटी के साथ पीले गुलाब के फूलों से खेलूँगी। एक गमले में मैंने पीले गुलाब की कटिंग लगा द...

धब्बे

  सायंकाल कालेज से घर आने पर लता आज सदा की भाँति माँ को पुकारने के बजाय कमरे में बैग पटक कर सीधे स्नानघर में घुस गई। अच्छे से स्नानकर उसने स्वयं को बड़ी तसल्ली से पोछा और फिर सुगन्धित टेलकम छिड़क कर कपड़े बदल लिए। कपड़े तो खैर वह प्रतिदिन ही बदलती थी अलबत्ता सायंकाल स्नान करना उसकी आदत में न था। माँ रसोई में चाय बनाते हुए सोच रही थी कि आज बिटिया की दिनचर्या में बदलाव कैसा?  दोपहर में ही मयंक ने आकर कहा था, "मम्मी, अब लता का कालेज जाना बंद करवा दीजिये।" "क्यों भला?" "मम्मी, आज मैं उसके कालेज गया था। वहाँ चुनाव हो रहे हैं और मेरा एक मित्र भी प्रत्याशी है। पता किया तो जानकारी हुई कि लता अक्सर सुनील के साथ गायब रहती है कॉलेज से। आज भी नहीं थी वह वहाँ पर।" "राम राम! तू अपनी बहन पर ही लांछन लगा रहा है। छि:.." "ठीक है, जिसदिन कुछ गड़बड़ हो जाय तब अपना सिर माथा धुन लेना।"  पैर पटकता हुआ मयंक बाहर निकल गया था। चाय के प्याले लेकर सीढियाँ चढ़ते हुए वह सोच रही थी कि क्या लता सच में सुनील के साथ बाहर घूमने गयी थी? कहाँ गयी होगी? कितने देर अकेले रहे होंगे? ...

पुरातन दादाजी

  हमारे गाँव में  मेरे दादाजी की तूती बोलती है साख भी है क्योंकि वह मुखिया भी रह चुके हैं। सदा नियमित जीवन को जीनेवाले सतासी साल के आदरणीय दादाजी को हम सब भाई बहन  बाबा कहते हैं। सब कुछ नियम से करते  पौ फटने के पूर्व ही सुबह में उठ कर नहा धो लेते हैं , जब तक बाबा शरीर से मजबूत रहे तब  तड़के सुबह साढ़े चार के आसपास गंगा नदी स्नान करने जाते , अब उनका देह  थक चुका था मतलब गरमी में पांच बजे व ठंड में सात बजे । नित कर्म के पश्चात पूजा पाठ दो घंटे तक करते ।खानपान भी शुद्ध घी से युक्त है देशी स्वाद के साथ चाहिए होता है उन्हें। दादाजी आयुर्वेदिक दवा का ही सेवन करते और सभी को आयुर्वेदिक दवा को  बढ़ावा  देना चाहिए,  कहते रहते। सबसे खास बात यह थी कि भोजन जमीन पर ही आसनी बिछाकर करते , पापा कहते रह गए कि आप डाइनिंग टेबल पर बैठ कर खाना खाया करें तो दादाजी अतिशय जोशपूर्ण अंदाज के साथ कहते कि अरे बबुआ, हम अंग्रेज हैं क्या ! उनके माकिफ  चेयर टेबल पर साहब बनकर  ब्रेकफास्ट लंच डिनर करें । तुम सब गाँव के जड़  और सभ्यता को भूलते जा रहे हो । फिर प...

गुलाबी शॉल

  माँ की तबियत ,अचानक से ख़राब हो गयी, खबर सुनकर ,शशि का मन बेचैन हो उठा। उसने तुरन्त अपने पतिदेव, सुधीर के ऑफिस में कॉल किया और  टिकिट बुक करने को कहा। सुधीर ने आई. आर .टी .सी. की वेबसाइट में सर्च किया, शशि को बताया कि अभी कन्फर्म टिकिट नही मिल पा रही है, जब मिल जायेगी,  तुम तब चली जाना । किन्तु शशि नहीं मानी। "मुझे तो बस ,आज ही जाना है" जब तक माँ से मिल ना लूँ,मन को शांति नहीं मिलेगी" ,कहकर फोन रख दिया... आनन फानन में अपना कुछ सामान बटोरकर, जल्दी से शुटकेस तैयार किया। जाड़े के दिन थे, सो एक ओवर कोट पहनकर, उसके ऊपर ,उसने अपनी पसन्दीदा 'गुलाबी शॉल' डाल ली । शाम पाँच बजे ट्रेन थी,स्टेशन पहुँची तो,बिलासपुर  के लिए ट्रेन आ चुकी थी । प्लेटफार्म पर भागती हुई ट्रेन की ओर गई और जो डिब्बा सामने दिखा, उसमें ही वो चढ़ गयी। किस्मत से ट्रेन में, खिड़की के पास उसे एक खाली सीट भी दिखाई दे गयी । उसनें अपना बैग सीट के नीचे खाली जगह देख, व्यवस्थित कर दिया। सीट पर बैठने के बाद  खिड़की के बाहर झाँका तो, अचानक उसकी नज़र प्लेटफ़ॉर्म पर बैठे एक छोटे बच्चे पर पड़ी। लगभग तीन चार बरस का ,साँवला...