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सुसाईड नोट

 रात के साढ़े बारह बजे होंगे सुमन अपना सारा घर का काम ख़त्म कर के TV देखने लगी. एक के बाद एक चैनल बदलने लगी. जैसे कुछ देखने लायक मिल ही न रहा हो. तभी उसके मोबाइल की घंटी बजी. उसके पति राज का फ़ोन था, उसने फ़ोन उठाया और धीमी सी आवाज़ में बोला, 'हेलो'. उसके बाद, सिर्फ "हां", "हम्म्म", "अच्छा" कहकर फ़ोन काट दिया. फ़ोन के साथ जैसे उसके मूड का स्विच भी ऑफ हो गया, और TV का भी. वो उठी और बच्चों के कमरे में एक बार चेक किया, कि वो ठीक से सो रहे हैं कि नहीं. उसके बाद, मटर पनीर, चिकेन सीक कबाब और पराठे, सब फ्रिज में रख दिए. वो कुछ बड़बड़ाई. "जब खाना नहीं था, तो पहले क्यों नहीं बताया. लेकिन इसमें नया क्या है? मेहनत तो सिर्फ वही करते हैं. घर में तो सब काम अपने आप ही हो जाता है." इतना कहते ही वो झटके से उठी, एक पेन और पेपर ले आई, और लिखने बैठ गयी. टाइटल था #सुसाईड_नोट डिअर हस्बैंड, मुझे वो दिन आज भी याद है, जब हम पहली बार मिले थे. उस कॉफ़ी शॉप के सोफे पर बैठ कर तुम मुझे देखते ही जा रहे थे. मैं अपने ऑफिस की मीटिंग के लिए आई थी. दो घंटों के बाद, जैसे ही मैं बाहर जाने लगी, तुम आगे बढ़े और तुमने मेरा नाम पूछा! मैं घबरा गयी, जल्दी से बाहर निकली, और ऑटो में बैठ के निकल गयी. तुमने मेरा ऑफिस तक पीछा किया, फिर घर तक. फिर तुम रोज़ मेरे पीछे-पीछे ऑफिस आते थे, जब तक मैंने तुम्हारे साथ कॉफ़ी पीने के लिए हां नहीं कर दी. उसके एक साल के अंदर शादी, तीन सालों में दो बच्चे, और अब मैं... सिर्फ मैं, रहती हूँ अकेली, हर वक़्त. इन बच्चों के साथ. तुम कब आते हो, कब जाते हो, कोई पता नहीं. मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी, ये सोच के, कि यही सही है. हर उस दोस्त से मिलने के लिए मना किया, जिसने मुझे अपनी बर्थडे, एनिवर्सरी, शादी, फेयरवेल में बुलाया, सिर्फ इस लिए कि घर में बच्चे अकेले होंगे. वहीं तुम, हर कांफ्रेंस, हर पार्टी, हर ऑफिस ट्रिप, हर मैच देखने गए, सिर्फ मेरे भरोसे, की मैं घर पर हूँ, तो घर का ध्यान रख ही लूंगी. कभी सोचा, कि मेरा ध्यान कौन रखेगा? वो बातें जो उस कॉफ़ी शॉप में तुमने छोड़ दीं, क्या तुम्हारा मन भर गया है उनसे? क्या मुझ से तुम्हारा मन भर गया है? शायद आदमियों के लिए अपना Mind Switch Off करना आसान है. हम औरतों के लिए क्यों नहीं? क्या हर चीज़ की चिंता करने का हक़ हमारा ही है? शायद हां! लेकिन मैं अब ये सब और नहीं कर सकती. तुम सुबह लौटोगे, और सोचोगे कि सबकुछ तुम्हें वैसे ही मिले. लेकिन मैं अब तुम्हें मिलना ही नहीं चाहती! अब सबकुछ तुम्हें ही सम्हालना है. मैं जा रही हूँ, तुम्हें ये समझा कर, कि तुम्हारी ग़ैरहाज़िरी में कुछ भी हो सकता है. लेकिन तुम्हें फ़िक्र हो, तब तो! जैसे ही उसने चिट्ठी खत्म की, चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ें आने लगीं. सुबह हो गयी थी. बच्चों के स्कूल, का टाइम हो गया था. उसने उन्हें तैयार किया, गाडी स्टार्ट कर के स्कूल ड्राप करने चली गयी. उसने वो Suicide Note तोड़ा-मरोड़ा, और डस्टबिन में डाल दिया. वो रोज़ इसी तरह अपने आपको एक चिट्ठी लिखती है. मन की भड़ास निकालती है, और सुबह उठ कर बच्चों को तैयार करती है. उसे पता है, कि ये ज़िन्दगी सिर्फ उसकी ही नहीं, उससे जुड़े हर किसी व्यक्ति की है. गुस्से और कायरता के कुछ क्षण उसके दिलो-दिमाग पर हावी ज़रूर होते हैं, लेकिन वो उनसे रोज जीत लेती है. अब सुमन बाहर से चाभी घुमाए जा रही है, लेकिन ताला खुलता ही नहीं! वो बच्चों को स्कूल छोड़ कर वापस आ गयी है और सोच रही है कि ताला तो उसने ठीक ही बंद किया था. तभी 'खट्ट' से दरवाज़ा खुलता है, और राज बदहवास सा नज़र आता है. वो अंदर गयी और देखा, राज ने डस्टबिन से निकाल कर उसका Suicide नोट पढ़ लिया. अब वो सर पकड़ कर बैठा है. कुछ कहने की हालत में नहीं, बस आंसू बहाए जा रहा है. सुमन किचन के अंदर गयी और एक ग्लास ठंडा पानी ले आई. राज ने उसका हाथ पकड़ा, और कहा, "मुझे माफ़ कर दो., सुमन क्या तुम ""एक कप कॉफ़ी पीने चलोगी मेरे साथ?"


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