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आखिरी रोटी का स्वाद

 रात के करीब नौ बज रहे थे। डाइनिंग टेबल पर खाना लग चुका था और ताज़े बने खाने की महक पूरे घर में फैल रही थी। विकास अपने ऑफिस के काम से थककर लौटा था और सीधा हाथ-मुँह धोकर खाने की मेज पर आ बैठा था। उसकी पत्नी, काव्या, पानी का जग मेज पर रख ही रही थी कि विकास ने अपनी प्लेट खिसकाते हुए कहा, “काव्या, तुम भी बैठ जाओ ना। खाना ठंडा हो रहा है, हम साथ में खा लेते हैं।”


काव्या ने रसोई की तरफ देखते हुए झिझक कर कहा, “विकास, मैं अभी कैसे बैठ जाऊँ? माँ जी रसोई में गर्मी में खड़ी होकर रोटियाँ सेंक रही हैं। उन्हें छोड़कर मैं पहले कैसे खा सकती हूँ? मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। मैं माँ जी के साथ ही खा लूँगी, तुम शुरू करो।”


विकास ने बिना कुछ सोचे-समझे बहुत ही सहजता से जवाब दिया, “अरे काव्या, तुम भी किस बात को लेकर परेशान हो रही हो। माँ की तो आदत है सबसे आखिर में खाने की। मैंने तो बचपन से उन्हें ऐसे ही देखा है। पहले पिताजी को खिलाती थीं, फिर हमें, और आखिर में जब पूरा काम खत्म हो जाता है तब अपनी थाली लगाती हैं। उन्हें ऐसे ही अच्छा लगता है। तुम आ जाओ, तुम्हें भी तो भूख लगी होगी।”


विकास के ये शब्द भले ही साधारण लग रहे हों, लेकिन रसोई में गैस के चूल्हे के सामने खड़ी उसकी माँ, सुमित्रा जी के कानों में ये पिघले हुए सीसे की तरह गिरे। उनके हाथ में पकड़ा चिमटा वहीं ठिठक गया। तवे पर रोटी फूल रही थी, लेकिन सुमित्रा जी का सीना एक अनजाने दर्द से पिचक सा गया। 


"आदत है..." सुमित्रा जी ने मन ही मन बुदबुदाया। "क्या सच में मेरी आदत है ठंडी रोटियाँ खाने की? क्या किसी भी इंसान को बचा-खुचा और आखिर में खाने का शौक हो सकता है? आज मेरे ही खून को, मेरे बेटे को लगता है कि मुझे इसमें खुशी मिलती है।"


उनकी बूढ़ी आँखों की कोरें अचानक छलक उठीं और धुएं के बहाने उन्होंने अपने आँसू पोंछ लिए। तवे की आँच से दूर, उनका मन अतीत की उन ठंडी और सुनहरी पगडंडियों पर दौड़ पड़ा जब वह 'सुमित्रा जी' नहीं, बल्कि सिर्फ 'सुम्मी' हुआ करती थीं। 


अपने मायके में सुमित्रा तीन बड़े भाइयों के बाद पैदा हुई इकलौती बेटी थी। पूरे घर की आँखों का तारा। उनके पिता जब भी खेत से लौटते, तो सबसे पहले सुम्मी को पुकारते। माँ जब भी कुछ मीठा बनाती, तो सबसे पहली कटोरी सुम्मी के हाथ में ही आती। भाइयों का बस चलता तो उसे जमीन पर पैर भी न रखने देते। जब सुमित्रा कभी-कभी भाइयों से पहले खाना खाने में नखरे करती, तो माँ प्यार से डांटते हुए कहतीं, "खा ले मेरी बच्ची। बेटियाँ तो चिड़िया होती हैं, पता नहीं ससुराल में कौन से नियम-कानून मिलें। वहाँ तुझे कौन ऐसे अपने हाथों से खिलाएगा? इसलिए जब तक यहाँ है, जी भरकर लाड़ कर ले।"


माँ के वो शब्द जैसे भविष्यवाणी साबित हुए। बीस साल की उम्र में सुमित्रा एक बड़े और पारंपरिक परिवार की बहू बनकर आ गई। ससुराल में धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन पुरानी रूढ़िवादी परंपराओं की बेड़ियाँ बहुत सख्त थीं। बहू की आवाज़ घर की चौखट से बाहर नहीं जानी चाहिए, बहू को हमेशा घूंघट में रहना चाहिए, और सबसे बड़ी बात—बहू कभी घर के मर्दों या बड़ों से पहले या उनके साथ खाना नहीं खा सकती। 


सुमित्रा को आज भी अपनी शादी के शुरुआती दिनों का वह वाकया याद था। सुबह से काम करते-करते वह बहुत थक गई थी और उसे जोरों की भूख लगी थी। दोपहर को जब सबने खाना खा लिया, तो उसने भी अपने लिए एक थाली लगा ली। तभी उसकी सास (विकास की दादी) रसोई में आ गईं और थाली देखकर आगबबूला हो उठीं। 


"तुम्हारे मायके में तुम्हें कोई संस्कार नहीं दिए क्या? घर के मर्द अभी बाहर बैठे हैं, तुम्हारे ससुर जी का खाना अभी पूरा नहीं हुआ है और तुम अपनी थाली लेकर बैठ गईं? इस घर की बहुएँ तब तक अन्न का दाना मुंह में नहीं डालतीं जब तक घर का आखिरी सदस्य खा न ले।"


उस दिन सुमित्रा को जो अपमान महसूस हुआ, उसने उसकी भूख को हमेशा के लिए मार दिया। उस दिन से उसने जो इंतजार करना शुरू किया, वह आज पैंतीस साल बाद भी खत्म नहीं हुआ था। पहले सास-ससुर, फिर पति, फिर बच्चे... सुमित्रा का नंबर हमेशा सबसे अंत में आता। कई बार दाल खत्म हो जाती, तो अचार से रोटी खा लेती। रोटियाँ ठंडी हो जातीं, तो उन्हें चाय में डुबोकर निगल लेती। धीरे-धीरे उसने शिकायत करना बंद कर दिया और यह उसकी 'नियति' बन गई। और आज, उसका अपना बेटा कह रहा था कि यह उसकी 'आदत' है।


सुमित्रा जी ख्यालों से बाहर आईं। उन्होंने एक गहरी सांस ली और आखिरी रोटी तवे से उतारकर कैसरोल में रख दी। उन्होंने सोचा कि वह जाकर विकास को खाना परोस देंगी। 


लेकिन तभी रसोई का दरवाजा खुला। काव्या अंदर आई। उसने बिना कुछ कहे सुमित्रा जी के हाथ से चिमटा ले लिया और उन्हें कंधे से पकड़कर रसोई के बाहर की तरफ ले जाने लगी। 


"अरे काव्या, क्या कर रही है? विकास खाना मांग रहा होगा, मैं उसे दे दूँ," सुमित्रा जी ने हड़बड़ाते हुए कहा।


"नहीं माँ जी," काव्या की आवाज़ में एक अजीब सी दृढ़ता थी। "आज विकास खुद अपना खाना परोसेगा, और वह तब तक नहीं खाएगा जब तक आप नहीं खा लेतीं।"


काव्या सुमित्रा जी का हाथ पकड़कर डाइनिंग टेबल तक ले आई। विकास अपनी प्लेट में सब्जी डाल ही रहा था कि काव्या ने उसे टोक दिया। 


"विकास, एक माँ की कभी आदत नहीं होती कि वह सबसे आखिर में और ठंडा खाना खाए। वह मजबूरी होती है, वह एक ऐसा त्याग होता है जिसे तुम जैसे बेटों और इस पुरुष-प्रधान समाज ने उनकी 'प्रकृति' मान लिया है। जब वो हमें गर्म रोटियाँ खिलाने के लिए आग के सामने जल सकती हैं, तो क्या हमारा यह फर्ज नहीं बनता कि हम एक दिन उन्हें अपने साथ बैठाकर सम्मान से खिलाएं? आज माँ जी हमारे साथ, और हमसे पहले खाना खाएंगी।"


विकास के हाथ से चम्मच छूट गया। काव्या के वो चंद शब्द विकास के सीने में किसी तीर की तरह लगे। उसे अचानक अपनी असंवेदनशीलता का अहसास हुआ। उसे याद आया कि कैसे उसने कभी पलटकर यह नहीं देखा कि उसकी माँ ने क्या खाया है और कब खाया है। उसे अपने कहे हुए शब्दों पर इतनी शर्मिंदगी महसूस हुई कि वह नजरें नहीं मिला पा रहा था।


वह अपनी कुर्सी से उठा, सुमित्रा जी के पास गया और उनका हाथ पकड़कर उन्हें अपनी कुर्सी पर बैठा दिया। विकास की आँखें नम थीं। "मुझे माफ कर दो माँ। मैं कितना अंधा हो गया था। मैंने तुम्हारे त्याग को तुम्हारी आदत समझ लिया। आज से इस घर में कोई भी तुम्हारे बाद खाना नहीं खाएगा।"


विकास ने खुद अपने हाथों से सुमित्रा जी की थाली लगाई और पहली गर्म रोटी उनके मुंह में निवाले के रूप में खिलाई। सुमित्रा जी की आँखों से आँसू छलक पड़े, लेकिन आज ये आँसू अपमान या दुख के नहीं थे। आज उन्हें पैंतीस साल बाद फिर से अपने मायके वाली उस 'सुम्मी' की याद आ गई, जिसे उसका पिता अपने हाथों से निवाला खिलाता था। आज एक बहू ने अपनी सास को सिर्फ एक थाली नहीं, बल्कि उसका खोया हुआ सम्मान और अधिकार लौटा दिया था।


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