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सोने का पिंजरा और माटी का घर

 दीनानाथ जी ने अपनी डायरी बंद करते हुए एक गहरी सांस ली और बोले, "तो ठीक है, कल सुबह ही हम लोग लड़की वालों के यहाँ शगुन लेकर जा रहे हैं। बात पक्की ही समझो।" 


अगली सुबह घर में काफी चहल-पहल थी। छोटा बेटा कुणाल, उसके माता-पिता दीनानाथ और सावित्री देवी, और बड़ा बेटा राघव सब जाने के लिए तैयार थे। बड़ी बहू मीरा ने भी अपनी एक अच्छी सी सूती साड़ी निकाल ली थी। वह सोच रही थी कि घर में एक नया रिश्ता जुड़ने जा रहा है, देवर के लिए लड़की देखने जाना है, तो घर की बड़ी बहू होने के नाते उसकी भी जरूरत होगी। वह बस तैयार होकर कमरे से बाहर आ ही रही थी कि तभी सावित्री देवी की तीखी आवाज़ पूरे दालान में गूंज उठी।


"अरे बड़ी बहू! तुम ये साड़ी-वाड़ी निकाल कर कहाँ चल दीं? हम सब जा तो रहे हैं, पूरी बारात ले जाने की क्या जरूरत है? तुम घर पर ही रुको। पीछे से कोई आने-जाने वाला हो सकता है, और फिर रात के खाने की तैयारी भी तो करनी है। हम लोग लौटेंगे तो थक जाएंगे, तुम बस रसोई का काम समेट कर रखना।" 


मीरा के कदम वहीं ठिठक गए। उसने एक बार अपने पति राघव की तरफ देखा, लेकिन राघव ने हमेशा की तरह नजरें चुरा लीं और फोन में व्यस्त होने का नाटक करने लगा। मीरा की आँखें छलक आईं, लेकिन उसने उन्हें अपने पल्लू की आड़ में पोंछ लिया। यह कोई पहली बार नहीं था जब उसे घर के किसी अहम आयोजन या खुशी से बेदखल किया गया हो। यह सब उसके साथ उस दिन से हो रहा था, जिस दिन वह ब्याह कर इस घर में आई थी।


मीरा एक बहुत ही साधारण और मध्यमवर्गीय परिवार की बेटी थी। उसके पिता एक ईमानदार पोस्टमास्टर थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन उसूलों पर जिया था। वे दहेज प्रथा के सख्त खिलाफ थे। जब राघव के लिए मीरा का रिश्ता आया था, तो सावित्री देवी और दीनानाथ जी ने खुद को बहुत आधुनिक और खुले विचारों वाला बताया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें बस एक संस्कारी लड़की चाहिए, दहेज नहीं। लेकिन यह सिर्फ उनके चेहरे का एक मुखौटा था। हकीकत में, वे उम्मीद लगाए बैठे थे कि भले ही वे मांगें नहीं, लेकिन लड़की वाले अपनी हैसियत से बढ़कर उन्हें सोने-चांदी और नकदी से लाद देंगे।


मीरा के पिता ने अपनी क्षमता के अनुसार सब कुछ बहुत अच्छे से किया, लेकिन वे कोई कार या लाखों की एफडी नहीं दे पाए। बस, यही बात सावित्री देवी के दिल में एक कांटे की तरह चुभ गई। तब से लेकर आज तक, मीरा को हर छोटी बात पर ताने सुनने पड़ते थे। "तुम तो खाली हाथ आई हो", "तुम्हारे पिता ने तो हमें ठग लिया"—ये शब्द मीरा के लिए रोजमर्रा की बात हो गए थे। हद तो तब होती थी जब राघव भी अपनी माँ का ही साथ देता था और मीरा की भावनाओं को पूरी तरह अनदेखा कर देता था। 


अब जब छोटे बेटे कुणाल की बारी आई, तो सावित्री देवी ने ठान लिया था कि वे कोई 'गरीब' या उसूलों वाली लड़की नहीं लाएँगी। उन्होंने शहर के एक नामी ठेकेदार की बेटी, रिया को कुणाल के लिए चुना था। रिया का परिवार बहुत अमीर था और वे शादी में पानी की तरह पैसा बहाने को तैयार थे। 


मीरा उदास मन से वापस अपने कमरे में गई, साड़ी बदलकर उसने अपने सूती कपड़े पहने और रसोई में जाकर रात के खाने की तैयारी में जुट गई। उसकी आँखों से गिरते आंसू आटे में मिल रहे थे। वह सोच रही थी कि क्या एक लड़की का अपना कोई वजूद नहीं होता? क्या उसके संस्कार, उसकी मेहनत और उसका निस्वार्थ प्रेम उस दहेज के आगे हार जाता है जो वह अपने साथ नहीं ला पाई?


उधर, दीनानाथ जी का परिवार जब रिया के घर पहुँचा, तो वहाँ का ठाठ-बाट देखकर उनकी आँखें चुंधिया गईं। विदेशी झूमर, मखमली सोफे और नौकरों की फौज देखकर सावित्री देवी मन ही मन बहुत खुश हो रही थीं कि चलो, अब उनके घर में भी एक 'स्टेटस' वाली बहू आएगी। लेकिन उनकी यह खुशी ज्यादा देर टिक नहीं पाई। 


बातचीत के दौरान रिया के पिता ने बहुत ही घमंड भरे लहजे में दीनानाथ जी से कहा, "देखिये दीनानाथ जी, हमने अपनी इकलौती बेटी रिया को राजकुमारियों की तरह पाला है। हम शादी में आपको किसी चीज की कमी नहीं होने देंगे, लग्जरी गाड़ी से लेकर आपकी मुँहमांगी रकम तक सब देंगे। लेकिन हमारी एक शर्त है। हमारी बेटी आपके घर जाकर कोई झाड़ू-पोंछा या रसोई का काम नहीं करेगी। वो ये सब करने के लिए नहीं बनी है। आपके घर में वैसे भी एक बड़ी बहू है, जो एक साधारण घर से है... घर का सारा काम वो ही संभालेगी, हमारी रिया तो बस राज करेगी।"


यह बात सुनकर सावित्री देवी और दीनानाथ जी के चेहरों का रंग उड़ गया। राघव और कुणाल भी असहज हो गए। रिया के पिता के शब्दों में जो अहंकार था, वह सीधे तौर पर उनके परिवार का अपमान था। उन्होंने मीरा को एक बहू नहीं, बल्कि उनके घर की एक 'नौकरानी' समझ लिया था। सावित्री देवी को पहली बार महसूस हुआ कि पैसों की चमक अक्सर इंसानों को अंधा कर देती है। वे लोग भारी मन से वहां से लौट आए। 


रात को जब वे थके-हारे और अपमानित महसूस करते हुए घर लौटे, तो उन्होंने देखा कि पूरे घर में बहुत ही सुकून भरी खुशबू फैली हुई थी। मीरा ने रात का खाना बिल्कुल तैयार रखा था। सावित्री देवी के पैरों में दर्द था, यह देखकर मीरा तुरंत गरम पानी ले आई और उनके पैरों की सिकाई करने लगी। उसने बिना कोई शिकायत किए, बिना यह पूछे कि वहाँ क्या हुआ, पूरी आत्मीयता से सबकी सेवा की। 


सावित्री देवी चुपचाप मीरा को देख रही थीं। आज उन्हें मीरा के मैले कपड़ों में भी एक अजीब सी चमक नजर आ रही थी। उन्हें रिया के पिता की वे चुभती हुई बातें याद आ रही थीं। सावित्री देवी को अचानक अपनी गलती का गहरा अहसास हुआ। उन्होंने सोचा कि जो लड़की लाखों का दहेज लाएगी, वह इस घर को अपना घर नहीं, बल्कि एक होटल समझेगी, जहाँ हर चीज के लिए दूसरों पर हुक्म चलाया जाएगा। और जिस मीरा को उन्होंने हमेशा पैसों के तराजू पर तौला, वही आज उनके हर दर्द में एक मजबूत ढाल बनकर खड़ी है। 


सावित्री देवी की आँखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। उन्होंने मीरा के हाथ पकड़ लिए और रुंधे हुए गले से बोलीं, "मुझे माफ कर दे बहू। मैं अपनी झूठी शान और पैसों के लालच में यह भूल गई थी कि घर सोने-चांदी से नहीं, बल्कि तुम्हारे जैसी संस्कारी और ममता से भरी बेटियों से बनते हैं। आज तुमने और उन अमीर लोगों ने मेरी आँखें खोल दी हैं।" 


राघव भी अपनी पत्नी के इस निस्वार्थ प्रेम को देखकर शर्मिंदा था। उसने आगे बढ़कर मीरा के कंधे पर हाथ रखा और अपनी खामोशी के लिए क्षमा मांगी। उस दिन उस घर में एक नए रिश्ते का जन्म हुआ था। सावित्री देवी ने तय कर लिया कि अब उनके घर में कोई भी फैसला दौलत के आधार पर नहीं, बल्कि इंसानियत के आधार पर लिया जाएगा।


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