ड्राइंग रूम का सन्नाटा एक जोरदार तमाचे की गूंज से टूट गया। विशाखा का सिर झन्ना गया और वह लड़खड़ा कर सोफे के किनारे जा गिरी। उसकी उंगलियां अपने सुन्न पड़ चुके गाल पर टिक गईं, जहां से अभी-अभी उसके पति समीर का भारी हाथ गुजरा था। सामने टीवी चल रहा था, जिस पर नजरें गड़ाए ससुर रमाकांत जी ऐसे बैठे थे जैसे उस कमरे में कुछ हुआ ही न हो।
वहीं पास रखी आरामकुर्सी पर बैठी सास, सुमित्रा देवी के चेहरे पर एक अजीब सी शांति और विजय की मुस्कान तैर गई। उन्हें अपने बेटे के इस रौद्र रूप में अपना रुतबा नजर आ रहा था। उन्होंने अपनी चाय का कप मेज पर रखते हुए एक सर्द लहजे में कहा, "जब औरत अपने पंख जरूरत से ज्यादा फड़फड़ाने लगे, तो उसके पर कतरने ही पड़ते हैं। बिना मेरी इजाजत के घर का पैसा मायके भेजने की हिम्मत कैसे हुई इसकी? समीर ने सही किया, इसे इसकी हद याद दिलानी जरूरी थी।"
विशाखा की आंखों से आंसुओं की एक गर्म धार बह निकली, लेकिन उसने अपने होठों को कसकर भींच लिया ताकि कोई सिसकी बाहर न आ सके। वह जानती थी कि अगर वह रोई, तो समीर का गुस्सा और भड़क जाएगा। उसने चुपचाप जमीन से अपना गिरा हुआ दुपट्टा उठाया और बिना कोई जवाब दिए रसोई की तरफ बढ़ गई।
यह कोई आज की बात नहीं थी। विशाखा और समीर की शादी को बारह साल हो चुके थे। इन बारह सालों में इस घर की चौखट ने विशाखा के न जाने कितने अनकहे आंसुओं को पीया था। इस विशाल और आलीशान घर में समीर, सास सुमित्रा देवी, ससुर रमाकांत जी, विशाखा की दस साल की बेटी तारा और सात साल का बेटा विवान रहते थे। समीर की एक छोटी बहन थी, नीलम, जो शादी के बाद दूसरे शहर में बस गई थी।
सुमित्रा देवी की फितरत थी घर की हर छोटी-बड़ी बात को राई का पहाड़ बनाना और उसे समीर के सामने इस तरह पेश करना जैसे विशाखा ने कोई बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो। 'आज दाल में नमक ज्यादा था, ये जानबूझकर मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ाना चाहती है', 'आज इसने मुझे बिना पूछे बच्चों को बाहर का खाना खिला दिया, इसे मेरे उसूलों की कोई परवाह नहीं', 'आज दिन में ये अपनी मां से आधा घंटा फोन पर बात कर रही थी, जरूर हमारे घर की बुराई कर रही होगी।' सुमित्रा देवी की ये बातें समीर के दिमाग में जहर की तरह घुल जाती थीं। समीर अपनी मां को भगवान मानता था और उनकी हर बात को पत्थर की लकीर। वह कभी विशाखा का पक्ष जानने की कोशिश ही नहीं करता था। उसका मानना था कि पैसा कमाकर वह विशाखा पर अहसान कर रहा है और इसलिए विशाखा को हर हाल में दबकर रहना चाहिए।
समाज और रिश्तेदारों की नजरों में विशाखा दुनिया की सबसे खुशनसीब औरतों में से एक थी। शहर के सबसे पॉश इलाके में उसका घर था। किटी पार्टियों और पारिवारिक शादियों में विशाखा हमेशा महंगी कांजीवरम साड़ियों और भारी कुंदन के गहनों से लदी नजर आती थी। उसके चेहरे पर एक सजी हुई, मुकम्मल मुस्कान होती थी, जिसे देखकर उसकी सहेलियां अक्सर कहती थीं, "विशाखा, तुम तो राज कर रही हो! समीर जैसा पति मिलना किस्मत की बात है, जो तुम्हें पलकों पर बिठाकर रखता है।"
उन सहेलियों को क्या पता था कि उन भारी गहनों के नीचे विशाखा ने अपनी रूह के कितने घाव छिपा रखे हैं। वो महंगी साड़ियां दरअसल उसकी खामोशी की कीमत थीं।
रसोई में खड़ी विशाखा आज सब्जी काटते हुए बार-बार अपने आंसुओं को पोंछ रही थी। आज का उसका 'गुनाह' सिर्फ इतना था कि उसने अपने छोटे भाई को उसकी कॉलेज की फीस भरने के लिए कुछ पैसे भेज दिए थे, वो भी अपनी उस छोटी सी बचत से, जो उसने घर के खर्चों से सालों में बचाई थी। सुमित्रा देवी को जब यह पता चला, तो उन्होंने समीर को भड़का दिया कि विशाखा उनके घर का पैसा चुराकर मायके लुटा रही है।
तभी रसोई के दरवाजे पर दस साल की तारा आकर खड़ी हो गई। उसने अपनी मां के लाल गाल और सूजी हुई आंखों को देख लिया था।
"मम्मा, आप रो रहे हो? क्या पापा ने आपको फिर से डांटा?" तारा की मासूम लेकिन सहमी हुई आवाज ने विशाखा के कलेजे को चीर दिया।
विशाखा ने तुरंत अपनी आंखें धोईं और चेहरे पर एक झूठी मुस्कान लाते हुए अपनी बेटी को गले लगा लिया। "नहीं मेरा बच्चा, मम्मा तो प्याज काट रही थी ना, इसलिए आंखों में पानी आ गया। पापा ने नहीं डांटा मुझे।"
तारा ने अपनी मां के सीने से लगकर कहा, "मम्मा, जब मैं बड़ी हो जाऊंगी ना, तो आपको इस घर से बहुत दूर ले जाऊंगी। जहां कोई दादी और पापा आपको रुलाएंगे नहीं।"
बच्ची की इस बात ने विशाखा को अंदर तक झकझोर दिया। वह रात भर सो नहीं पाई। समीर उसके बगल में करवट लेकर गहरी नींद में सो रहा था, जैसे उसने कुछ किया ही न हो। विशाखा अंधेरे में छत को घूरती रही। वह सोच रही थी कि वह किसके लिए ये सब सह रही है? बच्चों के लिए? लेकिन वह अपने बच्चों को क्या सिखा रही है? विवान बड़ा होकर सोचेगा कि पत्नी पर हाथ उठाना मर्दों का हक है, क्योंकि उसने अपने पिता को ऐसा करते देखा है। और तारा यह सीखेगी कि शादी को बचाने के लिए एक औरत को अपने आत्मसम्मान की बलि चढ़ानी ही पड़ती है।
विशाखा उठी और आईने के सामने जाकर खड़ी हो गई। उसने अपने चेहरे को देखा। बारह सालों में उसने खुद को पूरी तरह से खो दिया था। वह एक जिंदा लाश बन चुकी थी जो सिर्फ दूसरों के इशारों पर सांस ले रही थी। उसने तय कर लिया कि अब और नहीं। वह रातों-रात इस घर को छोड़कर नहीं जा सकती थी, क्योंकि वह आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं थी और उसे अपने बच्चों का भविष्य भी सुरक्षित करना था। लेकिन आज रात उस आईने के सामने विशाखा ने अपने अंदर के उस खौफ को मार दिया था जो उसे हर रोज डराता था।
अगली सुबह जब विशाखा ने समीर को नाश्ता परोसा, तो उसकी आंखें झुकी हुई नहीं थीं। सुमित्रा देवी ने फिर से किसी बात पर ताना मारा, लेकिन विशाखा ने आज खामोश रहने के बजाय बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ आवाज में जवाब दिया, "मां जी, मैंने कल अपने भाई को अपनी बचत के पैसे दिए थे। और आगे से अगर घर की किसी बात पर आपको मुझसे कोई शिकायत हो, तो आप सीधा मुझसे कहिएगा। मैं कोई बच्ची नहीं हूं जिसे बात-बात पर तमाचे की जरूरत हो।"
समीर ने चौंककर विशाखा की तरफ देखा। उसने पहली बार विशाखा की आंखों में एक ऐसी बेखौफ चमक देखी थी, जिसने उसे भी खामोश कर दिया। विशाखा जानती थी कि यह सिर्फ एक शुरुआत है और रास्ता बहुत कठिन है, लेकिन अब वह उस सुनहरे पिंजरे में एक बेजुबान चिड़िया बनकर घुटने को तैयार नहीं थी। उसने अपनी लड़ाई शुरू कर दी थी— खुद के लिए, अपने आत्मसम्मान के लिए और अपनी बेटी तारा को यह सिखाने के लिए कि अन्याय सहना, अन्याय करने से भी बड़ा पाप है।
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