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Showing posts from November, 2025

अनमोल रत्न

  बुजुर्ग बृजमोहन जी अपनी पत्नी के साथ अपनी रिटायर्ड जिंदगी बहुत हंसी खुशी बीता रहे थे.....पेंशन से दोनों पति पत्नी अपनी जीविका से खुश थे .....वैसे तो घर बडा था और उनके तीन बेटे बहुऐ भी थी मगर उनके तीनो बेटे अलग अलग शहरों में अपने अपने परिवारों के साथ व्यस्त थे..... वैसे उन्होनें नियम बना रखा था....दीपावली हो या कोई अन्य त्यौहार तीनों बेटे सपरिवार उनके पास आएंगे साथ रहेंगे खाएंगे वक्त बिताऐगे......पूरे एक सप्ताह तक.... वो एक सप्ताह कैसे मस्ती में बीत जाता था कुछ पता ही नही चलता था....सारा परिवार खुशी से झूम उठता ....अलग अलग भले ही रहते थे मगर उस एक सप्ताह में पूरी कसर साथ रहने की खत्म हो जाती ...उन सुखद अनुभव और खुशियों के सहारे बृजमोहन जी और सुधा की जिंदगी सुखद थी.... मगर फिर उनकी खुशियो को जैसे नज़र ही लग गई..... अचानक सुधा जी को एक रात दिल का दौरा पडा ...और एक झटके में उनकी सारी खुशियां बिखर गई..... तीनो बेटे दुखद समाचार पाकर दौड़े आए... उनके सब क्रियाकर्म के बाद सब शाम को एकत्रित हो गए... बड़ी बहू ने बात उठाई....बाबूजी... अब आप यहां अकेले कैसे रह पाऐंगे... आप हमारे साथ चलिऐ.... नह...

आज की लड़की

  ट्यूशन से लौटकर मीनाक्षी ने सायकिल बरामदे में रखी और चुपचाप अपने कमरे में चली आयी. रोज़ की तरह उसने न तो डाइनिंग रूम में टंगे मिट्ठू को दुलार किया और न ही मां से नाश्ते की फ़रमाइश ही की. कमरे में आकर उसने क़िताबें टेबल पर पटक दीं और आईने के सामने खड़ी होकर स्वयं को निहारने लगी. नहीं, उसमें तो कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. वो तो वही पुरानी मीनाक्षी है. सब की लाडली मीनू है…! फिर उसे आज ये एहसास क्यों हो रहा है कि मीनाक्षी न जाने कहां खो गयी है…? हंसती, खिलखिलाती, जीवन की उमंगों से भरपूर, बचपन की दहलीज़ लांघकर यौवन की मदिर सपनीली दुनिया में पग रखती, बाल सुलभ स्वभाव को अंक में समेटने का अब भी प्रयास करती, गुड़िया-सी लड़की सहसा औरत होने के एहसास से ठगी-सी क्यों खड़ी है…? नहीं, खड़ी कर दी गयी है. “मीनू! क्या हुआ बेटी?”. मां ने नाश्ते की ट्रे टेबल पर रखते हुए पूछा, तो नम आंखें छिपाती मीनाक्षी बोली, “कुछ नहीं मां, ज़रा सर भारी लग रहा था. आप नाश्ता रख दीजिए, मैं फ्रेश होकर खा लूंगी.” नाश्ता करके मीनाक्षी स्टडी टेबल पर बैठी, तो मन में बवंडर-सा चलने लगा. सामने खुली क़िताब के अक्षर धुंधलाने लगे. आंखों में ...

आखिर मुझे क्यों छला माँ

  शर्माते सकुचाते अनु ने अपने नए घर यानि ससुराल में अपना पहला कदम रखा । घूंघट की ओट में उसकी नजर किसी को ढूंढ रही थी, तभी सासू जी आरती की थाली लेकर आ गई और उसे कुछ राहत महसूस हुई । राहत इसलिए क्योंकि अपने ससुराल में अपने पति के अलावा अगर वह किसी को थोड़ा बहुत समझ पाई थी तो वह थी सासू जी । बात पक्की होने से लेकर शादी होने तक हर तरह की शॉपिंग जो अनु के लिए की गई उसमें सासू जी अनु को साथ ही ले जाती ताकि हर चीज अनु की पसंद से हो । इसी बहाने उसे सासू जी के साथ काफी समय बिताने को मिला और वह उनसे जल्दी ही घुल मिल गई । थोड़ा बहुत उनका स्वभाव समझ आने लगा । उसे तसल्ली थी कि अगर सासू जी सच में ऐसी ही है तब तो उसकी ट्यूनिंग बैठ ही जाएगी सासू जी के साथ । अनु के ससुराल में उसके सास-ससुर और पति के अलावा दो देवर थे पर कोई ननद नहीं थी और इस बात का दुख सासू जी को बहुत था कि उनके कोई बेटी नहीं है । वह अपनी बातों से कई बार जता चुकी थी कि वह तो बहू में बेटी को ढूंढ रही हैं, वह अनु को घर के हर मेंम्बर का नेचर बताती, किसको क्या पसंद है, क्या नहीं? एक साथ काम का कोई ज्यादा बोझ भी नहीं डाला, अनु बहुत खुश थ...

डैड का गुस्सा

  सोना को ससुराल आए लगभग 1 साल होने को आए ऐसा कोई दिन ना था जिस दिन उसने अपने डैड को याद ना किया हो। आज उसके डैड का जन्मदिन था।सुबह मंदिर गई ।पूजा की डैड की खुशी और सलामती के लिए दुआएँ माँगी।फिर शाम में केक लाकर अपने ससुरालवालों के साथ उनका जन्मदिन मनाने का प्रोग्राम बनाया। फिर केक काटने से पहले डैड को वीडियो कॉल लगाया उधर डैड मॉम के साथ उदास बैठे थे। सोना ने उन्हें देखते ही चहक के बोली " हैप्पी बर्थडे टू यू माई स्वीट डैड!!!! " पता है डैड यहाँ मैं आपकी डाँट आपके गुस्से को हर दिन मिस करती हूँ ।यहाँ सारे लोग मुझे बहुत प्यार करते हैं स्पेशली सासू माँ!एक दिन घर में मुहल्ले की औरतों को जब ये बोल रहीँ थीं कि "कितनी अच्छी बहु मिली है।कपड़ो ,बोली और स्वभाव में शालीनता जरूर इसके डैड से विरासत में मिले है।आज कल की लड़कियों में इतने संस्कार अब कहाँ मिलते हैं।सब इसके डैड का कमाल है।" "आपके लिए ये सुनकर डैड मेरा सर फक्र से ऊँचा हो गया।" "उस दिन सचमुच मुझे बहुत गुस्सा आया था और खूब रोई थी मैं जब कॉलेज फेयरवेल पार्टी के लिए जो मैंने एक्सपोज़ वाला ट्रांसपेरेंट ड्रेस लाय...

माँ को समझे।

  "ममता जल्दी करो यार मेरी फ्लाइट मिस हो जाएगी" " बस-बस हो गया ये लो आपका बैग इसमे आपके जरूरत के हिसाब से सब कुछ रख दिया है मैंने, अच्छा सुबोध सुनों ना रास्ते मे मुझे बुआ जी के घर छोड़ दोगे क्या, उनके घर पूजा है बड़े प्यार से बुलाया है उन्होंने मुझे। देखों मैं तैयार भी हू" सुबोध-"पागल हो गई हो क्या अब मैं तुमको ढो के वहाँ छोड़ू, और ये क्या इधर उधर घूमने का प्लान करती रहती हो, घर मे रहो और भी बहुत काम रहते है घर मे, बस जब देखो यहाँ जाना है वहाँ जाना है।" ममता चुप चाप पति की बात सुनती रही। उसका उदास चेहरा देख के सुबोध ने कहा -"अच्छा ठीक है मैं नही छोड़ सकता बच्चों के साथ चली जाओ।" ममता अपने बेटे मणि के पास आती है जो इस वक्त क्रिकेट मैच में पूरी तरह से डूबा हुआ है। "बेटा ये लो नाश्ता, अच्छा सुनों ना आज तो तुम्हारे कॉलेज की छुट्टी है ना, चलो ना बुआ जी के घर चलते है आज पूजा है उनके घर" मणि जो कि मैच देखने में व्यस्त है-"क्या माँ मैं इतना इम्पोर्टेन्ट मैच छोड़ कर आपके साथ पूजा में चलु, आप रूही के साथ चली जाओ, कैब बुक करवा देता हूं। मैं इतना र...

वासना की तलवार

  उसे नारी देह बहुत पसंद थी, वह भी बिना कपड़ों के हर दिन उसे खेलने के लिए एक नया गोश्त चाहिए था, आज भी वह गोश्त की दुकान की सीढ़ियां चढ़ रहा था। रोज की तरह कई जिस्म देखे फिर एक सबसे कम उम्र की देह उसे पसंद आई। उम्र उसकी कम थी पर हाव भाव से और इशारों से वह काफी समझदार लग रही थी वह उसे लेकर कमरे की तरफ चल दिया, पेमेंट पहले ही कर दी थी। कमरा भी ऐशो-आराम वाला था क्योंकि उसके पास पैसों की कमी नहीं थी। वह लड़की से बोला - "तुम्हें आज पहली बार देख रहा हूं.." "हां साहब कल ही मेरा सेठ मुझे यहां लाया है, अब देर मत करो साहब दिन में 10 कस्टमरों का कोटा पूरा करना है" यह कहकर उसने अपने शरीर से दीवार बन रहे कपड़ों को अलग कर दिया वह किसी भूखे कुत्ते की तरह झपट पड़ा जैसे उसकी आत्मा वासना के गंदे सागर में मिलने के लिए बेताब थी, थोड़ी देर में उसने अपनी मृगतृष्णा शांत कर ली थी। जब उसकी आंखों से वासना का खुमार कम हुआ तो कमरे में भी नजर दौड़ाई पलंग के बराबर टेबल पर एक फोटो देखते ही उसके पैरों से जमीन खिसक गई, वह जड़ा सा उस फोटो को देखता रह गया। उस फोटो में उसकी बेटी और उस घर में काम करने ...

सुसाईड नोट

  रात के साढ़े बारह बजे होंगे सुमन अपना सारा घर का काम ख़त्म कर के TV देखने लगी. एक के बाद एक चैनल बदलने लगी. जैसे कुछ देखने लायक मिल ही न रहा हो. तभी उसके मोबाइल की घंटी बजी. उसके पति राज का फ़ोन था, उसने फ़ोन उठाया और धीमी सी आवाज़ में बोला, 'हेलो'. उसके बाद, सिर्फ "हां", "हम्म्म", "अच्छा" कहकर फ़ोन काट दिया. फ़ोन के साथ जैसे उसके मूड का स्विच भी ऑफ हो गया, और TV का भी. वो उठी और बच्चों के कमरे में एक बार चेक किया, कि वो ठीक से सो रहे हैं कि नहीं. उसके बाद, मटर पनीर, चिकेन सीक कबाब और पराठे, सब फ्रिज में रख दिए. वो कुछ बड़बड़ाई. "जब खाना नहीं था, तो पहले क्यों नहीं बताया. लेकिन इसमें नया क्या है? मेहनत तो सिर्फ वही करते हैं. घर में तो सब काम अपने आप ही हो जाता है." इतना कहते ही वो झटके से उठी, एक पेन और पेपर ले आई, और लिखने बैठ गयी. टाइटल था #सुसाईड_नोट डिअर हस्बैंड, मुझे वो दिन आज भी याद है, जब हम पहली बार मिले थे. उस कॉफ़ी शॉप के सोफे पर बैठ कर तुम मुझे देखते ही जा रहे थे. मैं अपने ऑफिस की मीटिंग के लिए आई थी. दो घंटों के बाद, जैसे ही मैं बाहर ...