रात के करीब बारह बज चुके थे। शहर के सबसे बड़े मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल के तीसरे माले पर बने आईसीयू वॉर्ड में एक अजीब सी मनहूसियत और खामोशी पसरी हुई थी। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, जिसकी बूँदें कांच की बड़ी-बड़ी खिड़कियों पर टकराकर एक डरावनी लय बना रही थीं। वॉर्ड के भीतर सिर्फ जीवन रक्षक उपकरणों की लयबद्ध 'बीप-बीप' की आवाजें और वेंटिलेटर के पंप होने की 'फिस-फिस' ही उस निस्तब्धता को तोड़ रही थी। नीली और हरी मद्धिम रोशनियों के बीच हर बिस्तर पर कोई न कोई जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था। हवा में सर्जिकल स्प्रिट, दवाओं और उस खास अस्पताल वाली गंध का भारीपन था, जो किसी भी इंसान के दिल में खौफ पैदा करने के लिए काफी होता है। बेड नंबर सात पर साठ वर्षीय यशोदा देवी पिछले दस दिनों से कोमा में थीं। उनके शरीर में अनगिनत नलियां लगी थीं और चेहरे का आधा हिस्सा वेंटिलेटर के भारी मास्क से ढंका हुआ था। डॉक्टरों के विजिट का समय कब का खत्म हो चुका था। नाइट शिफ्ट का स्टाफ अपनी-अपनी डेस्क पर फाइलों में उलझा था या हल्की झपकी ले रहा था। मगर यशोदा की लगातार गिरती पल्स और क्रिटिकल हालत को देखते हुए, ...