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अंतिम श्वास का समर्पण

  रात के करीब बारह बज चुके थे। शहर के सबसे बड़े मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल के तीसरे माले पर बने आईसीयू वॉर्ड में एक अजीब सी मनहूसियत और खामोशी पसरी हुई थी। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, जिसकी बूँदें कांच की बड़ी-बड़ी खिड़कियों पर टकराकर एक डरावनी लय बना रही थीं। वॉर्ड के भीतर सिर्फ जीवन रक्षक उपकरणों की लयबद्ध 'बीप-बीप' की आवाजें और वेंटिलेटर के पंप होने की 'फिस-फिस' ही उस निस्तब्धता को तोड़ रही थी। नीली और हरी मद्धिम रोशनियों के बीच हर बिस्तर पर कोई न कोई जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था। हवा में सर्जिकल स्प्रिट, दवाओं और उस खास अस्पताल वाली गंध का भारीपन था, जो किसी भी इंसान के दिल में खौफ पैदा करने के लिए काफी होता है।  बेड नंबर सात पर साठ वर्षीय यशोदा देवी पिछले दस दिनों से कोमा में थीं। उनके शरीर में अनगिनत नलियां लगी थीं और चेहरे का आधा हिस्सा वेंटिलेटर के भारी मास्क से ढंका हुआ था। डॉक्टरों के विजिट का समय कब का खत्म हो चुका था। नाइट शिफ्ट का स्टाफ अपनी-अपनी डेस्क पर फाइलों में उलझा था या हल्की झपकी ले रहा था। मगर यशोदा की लगातार गिरती पल्स और क्रिटिकल हालत को देखते हुए, ...

वक्त की दस्तक

  "माफ़ कीजिएगा सर, यह टेबल पहले से एक परिवार के लिए रिज़र्व है। वीकेंड की वजह से कैफे में काफी भीड़ है, क्या आप प्लीज़ किसी और टेबल पर शिफ्ट हो जाएंगे?" वेटर ने एक पैंतीस-छत्तीस साल के आदमी से नम्रतापूर्वक कहा, जो अपने लैपटॉप की स्क्रीन और कॉफी के कप में बुरी तरह उलझा हुआ था। "कोई बात नहीं भैया, इन्हें बैठने दीजिए। हमें बस कुछ ही देर रुकना है, मेरे हसबैंड हमें पिक करने आ ही रहे होंगे," वेटर के ठीक पीछे खड़ी एक महिला ने अपनी शांत और ठहरी हुई आवाज़ में कहा। "ठीक है मैम, थैंक यू," वेटर ने सिर हिलाया और वहां से चला गया। मेधा ने अपनी पांच साल की बेटी परी को आराम से कुर्सी पर बिठाया, उसका मफलर ठीक किया और खुद उसके सामने वाली कुर्सी खींचकर बैठ गई। सामने बैठा शख्स, जिसे अपने काम में खलल पड़ना बिल्कुल पसंद नहीं था, झल्लाकर अपनी स्क्रीन से नज़रें हटाने ही वाला था कि उस आवाज़ ने उसे वहीं रोक दिया। उसने धीरे से अपना चेहरा उठाया और सामने देखा। वह पूरी तरह अवाक् था। "हल्के नीले रंग की सूती साड़ी, उस पर गहरे भूरे रंग का एक लंबा वूलन कोट। एक हाथ में काले पट्टे वाली ...

बंद खिड़की और उम्मीद की धूप

  दीनानाथ जी पिछले छह महीनों से एक ही कमरे में, एक ही खिड़की के पास अपनी व्हीलचेयर पर बैठे रहते थे। बाहर मौसम बदलते रहे, सर्द हवाओं की जगह हल्की गर्म धूप ने ले ली, लेकिन दीनानाथ जी के मन का मौसम नहीं बदला। वहाँ सिर्फ एक गहरी, काली और ठंडी उदासी छाई हुई थी। छह महीने पहले शहर के सबसे प्रतिष्ठित स्कूल के प्रिंसिपल रहे दीनानाथ जी का एक भयंकर सड़क दुर्घटना में शिकार हो गए थे। उनकी जान तो बच गई, लेकिन उनके शरीर का निचला हिस्सा हमेशा के लिए लकवाग्रस्त हो गया। जिस इंसान ने अपनी पूरी जिंदगी अनुशासन, दौड़-भाग और बच्चों के शोरगुल के बीच बिताई हो, उसके लिए एक जगह अपाहिज होकर बैठ जाना मौत से भी बदतर था। उनकी पत्नी सुमित्रा जी दिन-रात उनकी सेवा में लगी रहतीं। वे उन्हें उनके पसंदीदा भजन सुनाने की कोशिश करतीं, उनके लिए उनका मनपसंद खाना बनातीं, लेकिन दीनानाथ जी की आँखों में वो शून्यता जस की तस रहती। वे किसी से बात नहीं करते थे। उनका इकलौता बेटा, विवान, ऑफिस से थका-हारा लौटता और पिता की यह हालत देखकर अंदर ही अंदर टूटता रहता। विवान कई बार उनके पास बैठकर पुरानी बातें छेड़ने की कोशिश करता, लेकिन दीनाना...

वजूद की कीमत

  रात के आठ बज रहे थे। डाइनिंग टेबल पर आज मालपुए, पनीर की सब्ज़ी और पुलाव सजे थे। सुरभि ने आज सुबह ही अपने फ्रीलांस कंटेंट राइटिंग के पहले प्रोजेक्ट का चेक हासिल किया था। रकम बहुत बड़ी नहीं थी, सिर्फ पंद्रह हज़ार रुपये। लेकिन शादी के पाँच साल बाद, घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर अपनी मेहनत से कमाया गया यह उसका पहला पैसा था। सुरभि के चेहरे पर एक ऐसी चमक थी जो पिछले कई सालों से कहीं खो गई थी। उसने सोचा था कि आज उसका पति, विहान, उसकी इस छोटी सी कामयाबी पर खुश होगा, उसे गले लगाएगा और कहेगा कि उसे अपनी पत्नी पर गर्व है। तभी विहान अपने कमरे से बाहर आया। उसने टेबल पर सजे खाने को देखा और कुर्सी खींचते हुए बैठ गया। सुरभि ने चहकते हुए उसे खाना परोसा और अपना लिफाफा उसके सामने रख दिया। "विहान, आज मेरा पहला चेक आया है। पंद्रह हज़ार का! मैंने सोचा आज हम सेलिब्रेट करेंगे।" विहान ने लिफाफे को एक सरसरी निगाह से देखा, एक हल्का सा व्यंग्यात्मक ठहाका लगाया और लिफाफे को वापस खिसका दिया। "बस पंद्रह हज़ार? सुरभि, इतने में तो मेरी गाड़ी का एक महीने का पेट्रोल आता है। और ये जो तुमने इसके लिए दिन-...

"वजूद की राख से उठती एक नई सुबह"

  सुबह के छह बज रहे थे। शहर के सबसे पॉश इलाके में बने उस तीन मंजिला बंगले में अभी सन्नाटा था, लेकिन रसोई में बर्तनों की हल्की-हल्की खनक शुरू हो चुकी थी। यह खनक पल्लवी के हाथों की थी, जो पिछले पंद्रह सालों से इस घर की 'परफेक्ट बहू' होने का तमगा ढो रही थी। पल्लवी का पति, अविनाश, शहर का एक नामी बिल्डर था। सास, देवकी देवी, एक बेहद सख्त और रुतबे वाली महिला थीं, जिन्हें अपने पैसों और समाज में अपनी ऊंची नाक का बहुत घमंड था। पल्लवी एक बहुत ही होनहार और पढ़ी-लिखी लड़की थी। शादी से पहले वह एक मैगजीन में लेख लिखती थी। लेकिन शादी के बाद, देवकी देवी के एक फरमान ने उसकी कलम हमेशा के लिए छीन ली थी। "हमारे खानदान की बहुएं बाहर जाकर धक्के नहीं खातीं। तुम्हारे सारे शौक इस घर की चारदीवारी तक ही सीमित रहने चाहिए," देवकी देवी ने मुंह बनाते हुए कहा था। और अविनाश ने भी अपनी मां की हां में हां मिलाते हुए पल्लवी से कहा था, "पल्लवी, मेरे पास इतना पैसा है कि तुम्हें कुछ करने की जरूरत ही क्या है? घर संभालो, मां की सेवा करो, यही तुम्हारी दुनिया है।" उस दिन के बाद से पल्लवी ने अपने सपनों...

**अस्तित्व की राख से: एक नई शुरुआत**

रात के करीब दो बज रहे थे। बाहर आसमान से बरसती तेज बारिश की बूंदें हवेली के कांच की खिड़कियों पर ऐसे टकरा रही थीं मानो कोई अंदर आने की जिद कर रहा हो। लेकिन हवेली के अंदर का तूफान उस बाहरी बारिश से कहीं ज्यादा खौफनाक था। कांच के गिलास के फर्श पर गिरकर चकनाचूर होने की जोरदार आवाज ने पूरे सन्नाटे को चीर कर रख दिया। सुमेधा अपने कांपते हाथों से उस बिखरे हुए कांच को समेटने की कोशिश कर रही थी, जबकि सामने सोफे पर उसका पति, विक्रम, शराब के नशे में धुत, अपनी लाल हो चुकी आंखों से उसे घूर रहा था।  विक्रम लड़खड़ाती जुबान लेकिन तीखी नफरत के साथ चिल्लाया, "छोड़ दो इस कांच को! तुम्हारी जिंदगी भी तो इसी कांच की तरह है, जिसका कोई मोल नहीं। आज तुम मुझे मत रोकना सुमेधा, क्योंकि आज मैं जश्न मना रहा हूं। मैं उस चीज का जश्न मना रहा हूं जो तुम मुझे पिछले सात सालों में नहीं दे पाई। मैं बाप बनने वाला हूं! हां, तुमने सही सुना। विशाखा मेरे बच्चे को जन्म देने वाली है। उसने मुझे वह खुशी दी है जिसके लिए मैं तरस गया था।" सुमेधा के हाथ वहीं रुक गए। कांच का एक नुकीला टुकड़ा उसकी उंगली में चुभ गया था और वहां से...