"मेरे तो अपने माँ-बाप बचपन में ही चल बसे थे। मौसा-मौसी ने ही मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया, लेकिन एक माँ के आँचल की जो कमी थी, वह हमेशा मेरे दिल में एक नासूर की तरह चुभती रही। मैंने हमेशा यही सपना देखा था कि जब भी मेरी शादी होगी, तो मैं अपनी सास में अपनी माँ को और ससुर में अपने पिता को ढूँढूँगी। पर आज मुझे बहुत डर लग रहा है। क्या तुम्हारा परिवार इस बिन माँ-बाप की लड़की को कभी अपने दिल से अपना पाएगा?" मंदिर की सीढ़ियों से उतरते हुए अंजलि ने अपने आंसुओं को पोंछते हुए कहा। उसके पास खड़े समीर ने उसका कांपता हुआ हाथ अपने मजबूत हाथों में थाम लिया। उसने अंजलि की डरी हुई आँखों में झांकते हुए बड़ी नरमी से कहा, "अंजलि, तुम इतनी पवित्र और निस्वार्थ हो कि पत्थर दिल इंसान भी तुम्हें अपना ले। मैंने देखा है कि तुम अनजान लोगों की मदद करने में भी कभी पीछे नहीं हटतीं। फिर मेरे घरवाले तो अब तुम्हारे अपने हुए। मेरी माँ थोड़ी सख्त जरूर हैं, लेकिन उनका दिल बहुत साफ है। जब वो तुम्हारा ये निश्छल प्यार देखेंगी, तो तुम्हें अपनी बेटी से भी बढ़कर मानेंगी। तुम बिल्कुल मत डरो। और तुम्हारे मौसा-मौसी को भ...